सोमवार, 29 नवंबर 2021

*खेचर का अंग १७२(१/४)*

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*काल कुहाड़ा हाथ ले, काटन लागा ढाइ ।*
*ऐसा यहु संसार है, डाल मूल ले जाइ ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*खेचर का अंग १७२*
इस अंग में कपट आदि से युक्त व्यक्ति का परिचय दे रहे हैं ~
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उष्ण तेल अरु आरसी, तीजे खर का मांस ।
रज्जब सुधरे राख से, त्यों खेचर१ का गांस२ ॥१॥
गर्म तेल में राख डालने से वह उफनता रहकर ठीक हो जाता है । दर्पण राख से मांजने पर सुधर जाता है । गधे का मांस राख से अच्छा बन जाता है । उक्त तीनों भस्म से सुधर जाते हैं । वैसे ही कपटी१ मनुष्य का कपट२ भी उसके मुख पर राख डालने से ही सुधरता है अर्थात धिक्कारने से ही ठीक होता है ।
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रज्जब आपै ऊंट ने, तोड़ी नीति नकेल ।
तेउ१ नोक नुकते२ रहैं, कैब३ कसौटी४ बेल५ ॥२॥
ऊंट स्वयं ही अपने नाक में बंधी हुई नकेल की रस्सी को तोड़ दे, तो-भी१ उसके नाक में काष्ठ के टुकड़े२ की नोक तो रह जाती है, जिससे उसके नाक में कितनी३ ही बार नकेल डाली जाती है । वैसे ही खेचर मनुष्य नीति की मर्यादा को तोड़ देता है, तो-भी१ उसके दोष२ तो उसमें ही बने रहते हैं, जिनसे उसके ऊपर कितनी३ ही बार अर्थात बारंबार दु:ख४ आते ही रहते हैं, दुखों की परम्परा५ नष्ट नहीं होती ।
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सुध१ बुध२ सीले३ डरपि तूं, ठग ठंडे४ सौं भागी ।
ज्यों चूने का कांकरा, रज्जब जल मिल आगि५ ॥३॥
यदि तू शुद्ध१ बुद्धि२ और शीतल३ स्वभाव का है, तो भी शीतल४ स्वभाव ठग से डर कर दूर ही भाग, अर्थात दूर ही रह । कारण -जैसे चूने का कंकर शीतल होता है किन्तु शीतल जल से मिलते ही, वह अग्नि५ के समान गर्म हो जाता है । वैसे ही वह ठग की शुद्ध बुद्धि शीतल स्वभाव मनुष्य से मिलकर पूरी ठगी करती है ।
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डरिये खोटी खिमा१ सौं, पर घर घालण२ हार ।
रज्जब जाहै युद्ध में, किया सर्प संहार ॥४॥
बुरे मनुष्य की कपट पूर्ण क्षमा१ से भी डरते रहना चाहिये । यह कपट की क्षमा वाला कपटी मनुष्य दूसरे को घरों को नष्ट२ करने वाला ही होता है । जैसे कोई युद्ध में जाता हो और मार्ग में उसे सर्प काट ले, तब वह सर्प उसे युद्ध से तो रोक लेता है किंतु मार भी देता है । वैसे ही खेचर की क्षमा लड़ाई से तो बचा देती है किंतु समय पाकर शीघ्र ही मार भी देती है ।
(क्रमशः)

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