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*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*खोदत कूप हि राम कहै मुख,*
*काम भयो मन बौ१ सुख पायो ।*
*धूरि परी धसि मांहिं गये दबि,*
*दूरि करै थल होय सवायो ॥*
*होत उदास घराँ वह आवत,*
*नाम सुनी ध्वनि मास बितायो ।*
*कूप गये फिर होत सुनैं रव२,*
*काढ़त लागत धीर कहायो ॥१८९॥*
संतों की सेवा रूप कार्य हो जाने से, केवल को बहुत१ सुख प्राप्त हुआ ।
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संतों के चले जाने के पीछे, केवल जी मुख से राम राम कहते हुये कूप खोदने लगे और प्रसन्नता पूर्वक नीचे तक खोद लिया था किन्तु एक दिन कूप का रेतीला भाग टूट कर अत्यधिक धूलि कूप में पड़ गई, उससे केवलजी दब गये ।
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उस रेती को दूर करने का प्रयत्न करते थे तो वह स्थान उलटी सवाई रेती से भर जाता था । तब बनियाँ उदास होकर अपने साथियों के साथ घर आ गया । फिर एक मास व्यतीत होने पर, रेती से भरे हुये कूप में से एक छेद द्वारा राम नाम की ध्वनि किसी ने सुनी ।
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उसने आकर ग्राम में कहा, ग्राम वालों ने भी वहां आकर वह ध्वनि सुनी और केवल की वाणी पहचान कर केवल को निकालने के लिये खोदने लगे । खोदते हुये जब केवल के पास आ पहुँचे तब केवल ने कहा – धीरे-धीरे खोदो मेरे लग नहीं जाय ।
(क्रमशः)

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