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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ३७/४०*
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जिनकी वांणी बस४ नहीं, रज तम रूप प्रकास ।
बचन५ विचार्यां आलस है, सु कहि जगजीवनदास ॥३७॥
(४. बस=नियन्त्रण) (५. बचन=शास्त्र एवं गुरु के उपदेश वचन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनकी वाणी में सयंम नहीं है राजस, तामस रुप प्रकट भाषते हैं सात्विकता का अभाव है जो गुरु शास्त्रों के वचन पालन में आलस्य करते हैं, वे जन राजस या फिर तामस प्रवृत्ति के हैं ।
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देख लिखी एक बात हरि, देखी जैसी नाँहि ।
कहि जगजीवन सोइ तहां पहुँचै, रांम कहैं जे माँहि ॥३८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा ने एक बात लिखी है कि जो जैसा दिखता है वैसा होता नहीं है । जहाँ या जिसमें उन्हें राम भासते हैं वे वहां ही जाते हैं ।
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तेज पुंज घर निरंजन१, अंजन२ मिलै न मांहि ।
कहि जगजीवन उतपति बाजी३, हरिजन राजी नांहि ॥३९॥
(१. निरंजन=निष्कलंक(शुद्ध)} {२. अंजन=कलंक(अस्वच्छ)} (३. बाजी=माया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा का घर तेज पुंज का समूह है वहां जरा भी कलुषता नहीं मिलेगी । जहां माया का प्रभाव होता है हरिभक्त प्रसन्न नहीं होते हैं ।
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प्रश्न : रैणि४ बड़ी कै दिवस हरि, भगति बड़ी कै भाव ?।
कहि जगजीवन रांमजी, नीर बड़ा कै नाव ?॥४०॥
(४. रैणि=रात्रि)
संतजगजीवन जी जीव ब्रह्म का महत्व प्रश्न के माध्यम से बताते कह रहे हैं कि रात्रि बड़ी है या दिवस या जल बड़े महत्व की है या नाव ?
(क्रमशः)

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