सोमवार, 29 नवंबर 2021

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*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥९ आत्म निवेदन भक्ति॥*
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*॥ आत्म निवेदक की इच्छा अपूर्ण नहीं रहती ॥*
आत्म निवेदक की नहीं, इच्छा रहे अपूर्ण ।
हरि मन्दिर हित तन दिया, मामा जीया तूर्ण ॥१९२॥
दृष्टांत कथा – मामा और भानजा दो भक्त थे । तीर्थ यात्रा करने निकले थे । एक वन में भगवत् की मन्दिर रहित मूर्ति देख कर उसका मन्दिर बनाने का निश्चय करके धन की खोज करने लगे । एक नगर के जैन मन्दिर की मूर्ति पारस की सुन कर उसी मन्दिर में जाकर शिष्य बन गये । उनकी सेवा से प्रसन्न होकर मन्दिर का सब कार्य उन्हीं के हाथ में दे दिया ।
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मूर्ति को ले जाने के लिये अन्य मार्ग नहीं देख करके कलश का पेच खोल करके मामा ने मूर्ति को रस्सियों से बाँध दिया और भांजे ने ऊपर खेंच ली । मामा भी उसी मार्ग से निकलने लगा किन्तु उस छेद में ही फँस गया । जब बहुत यत्न करने पर भी नहीं निकल सका तब मामा ने कहा – 'तू मेरा शिर काट लेजा धड़ को यहां ही पड़ा रहने दे और जाकर इच्छा अनुसार भगवत् का मन्दिर बनवा । भानजे ने वैसा ही किया ।
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जब भानजा मूर्ति वाले बन में पहुंचा तो देखा कि कोई मन्दिर बनवाने की तैयारी कर रहा है । इससे उसे कुछ दुःख हुआ किन्तु आगे जाकर देखा तो अपना मामा ही खड़ा है । आनन्द के साथ दोनों मिले और फिर पारस मूर्ति से सोना बना २ कर श्री रंगनाथजी का विशाल मन्दिर बनवाया जो अनुपम है । इससे सूचित होता है कि आत्म निवेदक की इच्छा अपूर्ण नहीं रहती ।

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