मंगलवार, 9 नवंबर 2021

*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५८/६२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२०. सारग्राही कौ अंग ~ ५८/६२*
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जाति हमारी संत जन, जिनमैं उत्तम नांम ।
कहि जगजीवन मांहिली, मिलन तहां जहँ रांम ॥५७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हम संत जन हैं जो प्रभु नाम को ही उत्तम मानते हैं । और हमारे अंतर में सदा प्रभु मिलन की चाह रहती है ।
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जाति हमारी हरिभगत, जिन की हरि सौं प्रीति ।
कहि जगजीवन नांम की, जे राखैं रस रीति ॥५८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमारी जाति हरिभक्ति है । जो नाम स्मरण करके प्रभु मिलन कि सब रीति निभाते हैं।
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हरि जन जाति पिछांणि ले, दूजी परहरि आंन ।
सतगुरु ए सम्बन्ध करि, जगजीवन निज ग्यांन ॥५९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे साधुजन परमात्मा को पहचान लें और सब व्यर्थ को छोड़ दें अपने ज्ञान विवेक से अपना सम्बन्ध प्रभु से रख ।
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जाति हमारी कोई न जांणैं, जे जांणै तो रांम ।
कहि जगजीवन धर्या२ है, तब लगि धरिये नांम ॥६०॥
{२. धर्या=लोक(पृथ्वी आदि संसार)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमारी जाति कोइ नहीं जानता जो जानता है वो प्रभु ही जानते हैं । जब तक पृथ्वी पर है तब तक कुछ भी नाम रख ले ।
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जाति पांति हरि अलख निरंजन, जाति जगतगुरु३ रांम ।
कहि जगजीवन जाति हमारी, जे जन सुमिरैं रांम ॥६१॥
{३. तुलनीय श्रीदादूवाणी=
कुल हमारे केसवा, सगा त सिरजनहार ।
जाति हमारी जगतगुरु, परमेसुर परिवार ॥ 
(निहकर्मी० ८/१३) ।}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हमारी पहचान बताने वाली हमारी जाति स्वयं निरंजन देव हैं । जो सारे संसार के गुरु हैं । हमारे समुदाय में वे ही जन हैं जो प्रभु का स्मरण करते हों ।
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कहि जगजीवन सब कहै, अपणीं अपणीं जात ।
उस मुहुरत४ की खबर नहिं, जनम भया जिहिं रात ॥६२॥
{४.मुहुरत=मुहूर्त(विशिष्ठ क्षण)}
॥इति॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब अपनी जाति की महत्ता बतलाते हैं उन्हें उस क्षण की सुध नहीं है कि वह क्षण जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ वह क्यों आया वह जीव के जीवन उद्देश्य को लेकर अंधकार से प्रकाश की और ले जाने के लिये ही आया है ।
इति सारग्राही कौ अंग सम्पूर्ण ॥२०॥
(क्रमशः)

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