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*दादू काढे काल मुखि, श्रवणहुँ सबद सुनाइ ।*
*दादू ऐसा गुरु मिल्या, मृतक लिये जिलाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*मृत्यु भयी द्विज नारि सती हुत,*
*जोरि करौ दुय शीश नवायो ।*
*राम सुहागनि वैन कह्यो पति,*
*मौत भई उठ है हरि भायो ॥*
*राम भजो सब ही कुल से कहि,*
*मान लिई उन वेगि जिवायो ।*
*भक्त भये सब साखतता तज,*
*लेश रहे मन लोक न पायो ॥१८३॥*
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काशी में एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गई थी । उसको श्मशान में ले जा रहे थे । उसकी पत्नी भी सती होने की पीछे २ जा रही थी । तुलसीदासजी को देखकर दोनों हाथ जोड़ के मस्तक नमा कर उसने प्रणाम किया ।
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तब तुलसीदास जी ने कहा - "राम कृपा से सौभाग्यवती हो ।" वह बोली - भगवन् ! मेरे पति देव की तो मृत्यु हो गई है, मैं सती होने जा रही हूं। आपने कहा- यदि तुम राम जी का भजन करो तो राम कृपा से यह तेरा पति जीवित हो सकता है।
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फिर उसके सब कुटुम्ब को बुलवा कर कहा- आज से तुम सब प्रेम पूर्वक रामजी का भजन करो तो यह राम कृपा से जीवित हो सकता है। सब परिवार ने स्वीकार कर लिया। तब सब को कहा- सबके सब राम नाम की ध्वनि करो। ध्वनि प्रारंभ होते ही वह मृतक भी उठकर सब के साथ ध्वनि करने लगा।
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फिर सब परिवार वाले हरि विमुखता को त्याग कर भक्त बन गये। हरि विमुखता का लेश भी मन में रहे तो प्राणी हरि का लोक नहीं पा सकता किन्तु तुलसीदास जी ने सब की हरि विमुखता रूप व्याधि नष्ट करके सबको हरि धाम का अधिकारी बना दिया।
(क्रमशः)

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