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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१२६)*
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१२६. विरह विलाप । झपताल
मरिये मीत विछोहे, जियरा जाइ अंदोहे ॥टेक॥
ज्यों जल विछुरे मीना, तलफ तलफ जिय दीन्हा,
यों हरि हम सौं कीन्हा ॥१॥
चातक मरै पियासा, निशदिन रहै उदासा,
जीवै किहि बेसासा ॥२॥
जल बिन कमल कुम्हलावै, प्यासा नीर न पावै,
क्यों कर तृषा बुझावै ॥३॥
मिल जनि बिछुरो कोई, बिछुरे बहु दुख होई,
क्यों कर जीवै जन सोई ॥४॥
मरणा मीत सुहेला, बिछुरन खरा दुहेला,
दादू पीव सौं मेला ॥५॥
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भा० दीo-हे प्रभो ! तव विरहदुःखेन मे मरणप्राया दशा जाता । मन्च शोकाकुलं जातम् । यथा जलं विना मत्स्यो मृतो भवति । तथैव हरिदर्शनविरहेणाहमपि मृततुल्यो जातः । यथा च चातक: स्वातिनक्षत्रजलबिन्दु विना पिपासितो भवति रात्रि दिनञ्चोदासीनस्तिष्ठति । तथैवाहमप्यौदासीन्यं गतोऽस्मि । यथा च जलं बिना पुष्पं म्लायति तथैव प्रभुदर्शनं विनाहमपि म्लानिमनुभवामि । यथा पिपासो: पयो विना न सा पिपासा शाम्यति । तथैव प्रभुं विना मम क्लेशो न निवर्तते । वियोगे महहुःखमनुभूयते मया । अत: साधकेन सर्वात्मना प्रभुमाश्रित्यैव कीर्तितव्यमितिभाव: । अन्यथा दुःखाद् दुखान्तरमम्युपगच्छति जनः । हे प्रभो ! त्वं तु मे परमसुहृदसि त्वद् वियोगे दुःखं संयोगे च सुखमिति विज्ञाय पुरुषेण सततं संयोगनिष्ठेन भाव्यम् येन कदापि वियोगो न स्यात् । इत्येवं सततं प्रार्थयेऽहम् ।
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हे प्रभो ! आपके विरहजन्य दुःख से मेरी मृतक तुल्य दशा हो गई । मन शोक से व्याकुल हो रहा है । जैसे जल के बिना मछली मर जाती है, वैसे मैं भी हरि दर्शनों के बिना मरे के समान हो गया हूं ।
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जैसे चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र के पानी की बिन्दु के बिना प्यासा ही रहता है और रात दिन उदास ही रहता है, वैसे ही आप के विरह बिना में सूना सा हो गया हूं ।
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जैसे जल के बिना कमल का पुष्प मुर्झा जाता है, वैसे ही प्रभु दर्शन बिना सूना-सा हो गया हूं ।
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जैसे प्यासे को पानी के बिना शान्ति नहीं मिलती है, वैसे ही प्रभु के बिना मेरा क्लेश भी नहीं मिटता । वियोग में तो महादुःख है । अतः प्रभु के साथ सर्वथा सर्वात्मना संयुक्त रहना चाहिये, अन्यथा एक दुःख से दूसरे दुःखों में गिरता ही जायेगा ।
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हे मेरे परम मित्र परमात्मन् ! अब मैंने जान लिया है कि तेरे वियोग में परम दुःख और मिलन में महासुख है । अतः मैं सदा आपसे मिलकर रहना चाहता हूं, जिससे आपका मेरे से कभी वियोग न हो ।
(क्रमशः)

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