शनिवार, 20 नवंबर 2021

*लोक लज्जा का अंग १६८(५/९)*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 卐 *सत्यराम सा* 卐 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।*
*क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥*
==============
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*लोक लज्जा का अंग १६८*
.
रज्जब रीते१ राखै लोक लज, बहती२ बूझै३ नांहि ।
सर्वस्व सौंपे सगहुं को, अरु उनकी आज्ञा मांहिं ॥५॥
लोक लाज प्राणियों को परमार्थ से खाली१ रखती है अर्थात परमार्थ नहीं करने देती । वे माया२ में मस्त होने के कारण इस बात को नहीं समझते३ और अपना सर्वस्व अपने सम्बन्धियों४ को सौंप कर उनकी आज्ञा में ही रहते हैं । ईश्वर की आज्ञा मान कर परमार्थ नहीं करते ।
.
पति१ राखै परिवार२ की, परमेश्वर पति३ खोय ।
रज्जब शठ४ शंकट पड़े, मुक्ति कहां ते होय ॥६॥
मूर्ख४ प्राणी परमेश्वर की आज्ञा रूप लाज३ को खोकर कुटुम्ब२ की लज्जा१ रखते हैं । इसी से दुखों में पड़ते हैं इनकी मुक्ति कहां से होगी ? अर्थात नहीं हो सकती ।
.
लोक लाज शूरा सती, लोक लाज दत४ शीश ।
जन रज्जब रोटी न दे, नर सु निमित जगदीश ॥७॥
लोक लाज से शूरवीर बन कर रण में मर जाते हैं । लोक लाज से नारी सती बन कर जल जाती है । लोक लाज से प्राणी प्रसन्नता के साथ शिर का दान१ कर देता है किन्तु जगदीश्वर के निमित्त एक रोटी भी नहीं देता ।
.
भरम१ धर्म करि जो भले, साधू श्रवण न धार ।
रज्जब उज्वल रैनि के, सु दिवस न दीसैं रार ॥८॥
जैसे रात्रि के उज्वल तारे भी दिन में नहीं दीखते, वैसे ही अज्ञानावस्था१ में लोक लाज से धर्म करके जो भले भासते हैं, उनके वचन को संतों के श्रवण धारण नहीं करते अर्थात उनकों संत धार्मिक पुरुषों के वचन के समान नहीं सुनते ।
.
कुल पीहर कुल सासरो, गुरु कीया कुलवंत ।
रज्जब अकुल न उर बस्या, अकुल हि शोध्या संत ॥९॥
सांसारिक प्राणी लोक लाज से पितृकुल और श्वशुरकुल में ही रहते हैं तथा गुरु भी कुल वाले को अर्थात गृहस्थ को ही बनाते हैं । इनके मन में परिवार रहित शुद्ध ब्रह्म की खोज तो लोक लाज को त्यागने वाले संत ही विचार द्वारा कराते हैं ।
.
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित लोक लज्जा का अंग १६८ समाप्तः ॥सा. ५१२४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें