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*प्रेम भक्ति जब ऊपजै, पंगुल ज्ञान विचार ।*
*दादू हरि रस पाइये, छूटै सकल विकार ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*उपजणि का अंग १६६*
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रज्जब अर्भक१ आड़ि का, ताहि२ तिरावै कौन ।
जन्मत ही जलनिधि तिरै, करै नीर पर गौन३ ॥९॥
आड़ि नामक जल पक्षी के बच्चा१ होता है तब उसे२ कौन तिराता है ? वह जन्मते ही समुद्र पर तैरने लगता है तथा थल पर गमन करता है । वैसे ही बहुत से शुकदेवादि जन्मते ही अपनी उपज रूप ज्ञान द्वारा संसार से तिर जाते हैं ।
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बत्तक बच्चे मीन सुत, अर्भक१ आड़ि तिरंत ।
कौन सिखावै कौन को, जब उपजै यहु मंत ॥१०॥
बतक, मच्छी और आड़ि के बच्चे१ अपनी उपज से ही तैरते हैं । वैसे ही जब बुद्धि में यह आत्म-विचार उत्पन्न हो जाता है तब कौन किस को सिखाता है ? अर्थात सिखाने की आवश्यकता ही नहीं रहती ।
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अनल अंड जब उग्रहै१, तब अर्भक२ ऊंचा जाय ।
त्यों रज्जब उपजणी जुगति, आतम ब्रह्म समाय ॥११॥
अनल पक्षी का अंडा फूट कर जब बच्चा२ निकलता१ है, तब ऊंचे आकाश में ही जाता है । वैसे ही ज्ञान उत्पन्न होने रूप मुक्ति से अज्ञान को नष्ट करके आत्मा ब्रह्म में ही समाता है ।
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जा जीव में यह ऊपजी, साहिब कीजे यादि ।
रज्जब रोक्यों क्यों रहै, वसुधा१ बके सु बादि ॥१२॥
जिस जीव में यह बात उत्पन्न हो गई है कि - निरंतर भगवान का स्मरण करना चाहिये, वह किसी के रोकने से कैसे रुक सकता है ? वह तो रोकने वालों को समझना है कि - ये पृथ्वी१ के प्राणी व्यर्थ ही बकते हैं ।
(क्रमशः)

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