बुधवार, 10 नवंबर 2021

*संसारी तथा ‘सोऽहं’*

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*हंस सरोवर तहाँ रमैं, सुभर हरि जल नीर ।*
*प्राणी आप पखालिये, निर्मल सदा होइ शरीर ॥*
*मीन मगन मांहीं रहैं, मुदित सरोवर मांहिं ।*
*सुख सागर क्रीड़ा करैं, पूरण परिमित नांहिं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. २४६)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)निष्काम कर्म । संसारी तथा ‘सोऽहं’*
आज पंचवटी में दो साधु आये हुए हैं । वे गीता और वेदान्त यह सब पढ़ते हैं । दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण के कमरे में आकर दर्शन कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए हैं । साधुओं ने प्रणाम किया, फिर जमीन पर चटाई पर बैठ गये । मास्टर आदि भी बैठे हुए हैं । श्रीरामकृष्ण हिन्दी में बातचीत कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - क्या आप लोगों की सेवा हो चुकी है ?
साधु - जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण - क्या खाया ?
साधु - रोटी दाल, आप खाइयेगा ?
श्रीरामकृष्ण - नहीं, मैं तो थोड़ा-सा भात खाता हूँ । क्यों जी, आप लोग जो जप और ध्यान करते हैं, यह सब निष्काम ही करते हैं न ?
साधु - जी महाराज ।
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श्रीरामकृष्ण - यही अच्छा है । और फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए न ? गीता में लिखा है ।
साधु - (दूसरे साधु से) –
यत् करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम् ॥
श्रीरामकृष्ण - उन्हें एक गुना जो कुछ दोगे, उसका हजार गुना प्राप्त होगा । इसीलिए सब काम करके जलांजलि दी जाती है - कृष्ण के लिए फल का अर्पण किया जाता है ।
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"युधिष्ठिर जब सब पाप कृष्ण को अर्पित करने के लिए तैयार हुए, तब एक आदमी ने(भीम ने) उन्हें रोका । कहा, 'ऐसा कर्म न करो - कृष्ण को जो कुछ दोगें, उसका हजार गुना तुम्हें प्राप्त होगा ।' अच्छा क्यों जी, निष्काम होना चाहिए - सब कामनाओं का त्याग करना चाहिए न ?”
साधु - जी महाराज !
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श्रीरामकृष्ण - परन्तु मेरी तो भक्ति कामना है । वह बुरी नहीं, अच्छी ही है । मीठी चीजें बुरी हैं, आम्ल पित्त निर्माण करती हैं, किन्तु मिश्री उलटे उपकार करती है । क्यों जी ?
साधु - जी महाराज ।
श्रीरामकृष्ण - अच्छा जी, वेदान्त कैसा है ?
साधु - वेदान्त में षट्शास्त्र हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - परन्तु 'ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या' यही वेदान्त का सार है, मैं कोई अलग वस्तु नहीं हूँ, मैं ब्रह्म हूँ - यह क्यों जी ?
साधु - जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु जो लोग संसार में हैं, और जिनमें देहबुद्धि है, 'सोऽहम्' भान उनके लिए अच्छा नहीं । संसारियों के लिए योगवाशिष्ठ वेदान्त अच्छा नहीं; बहुत बुरा है । संसारी सेव्य और सेवक के भाव में रहेंगे । 'हे ईश्वर, तुम सेव्य हो - प्रभु हो, मैं सेवक हूँ - तुम्हारा दास हूँ ।'
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"जिनमें देह बुद्धि है, उन्हें 'सोऽहम्' की अच्छी धारणा नहीं होती ।"
सब लोग चुपचाप बैठे हुए हैं । श्रीरामकृष्ण आप ही आप धीरे-धीरे हँस रहे हैं । आत्माराम अपने ही आनन्द में मग्न रहते हैं ।
एक साधु दूसरे के कान में कह रहा है, 'अरे देखो, इसे परमहंस अवस्था कहते हैं ।"
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर से) - हँसी आ रही है ।
श्रीरामकृष्ण बालक की तरह आप ही आप हँस रहे हैं ।
(क्रमशः)

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