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*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*पाय पर्यो हम जीव उबार हु,*
*देखि अजम्मत लाज नयो है ।*
*सांत करे सब भूप हि भाखत,*
*ह्यां न रहो गढ़ राम भयो है ॥*
*त्याग दियो सुन और करावत,*
*हाजर है नहि फेरि पयो है।*
*जाय बनारस आय वृन्दावन,*
*नाभ हि से जु कवित्त लियो है ॥१८६॥*
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बादशाह दौड़कर आपके चरणों में पड़ गया और बोला- आप हम जीवों का उद्धार करें। तुलसीदासजी ने कहा- कुछ करामात तो देख लो। बादशाह ने कहा सब देख लिया। अब रक्षा कीजिये ।
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तुलसीदासजी ने कहा- रक्षा चाहो तो सब लोग हाथ उठाकर रामजी की दोहाई दो। उन्होंने ऐसा ही किया। तब हनुमानजी ने अपने उस उपद्रव को शांत कर दिया। फिर बादशाह ने कहा- कोई सेवा बताइये ।
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तब तुलसीदासजी ने बादशाह को कहा- अब यहां नहीं रहो। यह गढ़ तो रामजी का हो गया है, यह सुनकर उसको त्याग दिया और दूसरा बनवा लिया। उसमें अब तक भी वही बात है अर्थात् कोई नहीं रहता । उसमें कोई फेरफार नहीं हुआ है।
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फिर दिल्ली से काशी को जाते समय मार्ग में वृन्दावन में आकर नाभा जी से प्रेम पूर्वक मिले। नाभाजी ने भक्तमाल में आपके यश का छप्पय लिखा था सो सुनाया। तब श्री राम कृपा से दोनों ही संतों को परमानन्द का अनुभव हुआ था।
(क्रमशः)

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