रविवार, 14 नवंबर 2021

*साधु और भक्त*

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*दादू नैनहुँ भर नहिं देखिये, सब माया का रूप ।*
*तहँ ले नैना राखिये, जहँ है तत्त्व अनूप ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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मणि - कामिनी और कांचन में रहने से कुछ न कुछ आँच तो देह में जरूर ही लग जायेगी । आपने कहा था - 'जयनारायण बहुत बड़ा पण्डित था, बुड्ढा हो गया था परन्तु जब मैं गया तब देखा, धूप में तकिए डाल रहा था ।
श्रीरामकृष्ण - परन्तु पण्डिताई का अहंकार उसे न था । और जैसा उसने कहा था, उसी के अनुसार अन्त में काशी में जाकर रहा ।
"बच्चों को मैने देखा, पैरों में बूट डाले हुए थे, अंग्रेजी पढ़े-लिखे हैं ।"
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श्रीरामकृष्ण प्रश्नोत्तरों के द्वारा मणि को अपनी अवस्था समझा रहे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - पहले बहुत अधिक उन्माद था - अब घट क्यों गया ? - परन्तु कभी कभी अब भी होता है ।
मणि - आपकी अवस्था कुछ एक तरह की तो है ही नहीं । जैसा आपने कहा था, कभी बालवत् - कभी उन्मादवत् - कभी जड़वत् - कभी पिशाचवत्, ये ही सब अवस्थाएँ कभी कभी हुआ करती हैं । और कभी कभी सहज अवस्था भी होती है ।
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श्रीरामकृष्ण - हाँ बालवत् । और उसी के साथ बाल्य, किशोर और युवा, ये अवस्थाएँ भी होती हैं । जब ज्ञानोपदेश दिया जाता है, तब युवा अवस्था होती है ।
"और किशोर अवस्था में तेरह साल के बच्चे की तरह मजाक सूझता है; इसीलिए लड़कों के बीच में मजाक किया जाता है ।
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“अच्छा, नारायण कैसा है ?"
मणि - जी, उसके सभी लक्षण अच्छे हैं ।
श्रीरामकृष्ण - कद्दू की गढ़न अच्छी है - तानपूरा खूब बजेगा ।
"वह मुझे कहता है, आप सब कुछ है । जिसकी जैसी धारणा है, वह वैसा ही कहता है । कोई कहता है, ये ऐसे ही साधु और भक्त हैं ।
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"जिसके लिए मैंने मना कर दिया है, उसकी उसने खूब धारणा कर ली है । उस दिन परदा समेटने के लिए मैंने कहा था, उसने न समेटा ।
"गिरह लगाना, सीना, परदा लपेटना, दरवाजे में और सन्दूक में ताला लगाना, इस तरह के कामों के लिए मैंने मना कर दिया था - उसने ठीक धारणा कर रखी है । जिसे त्याग करना है, उसे इन बातों का साधन कर लेना चाहिए । यह सब संन्यासी के लिए है ।
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"साधना की अवस्था में कामिनी दावाग्नि-सी है - कालनागिनी-सी । सिद्ध अवस्था के पश्चात्, ईश्वर-प्राप्ति हो जाने पर, वह माँ आनन्दमयी की मूर्ति हो जाती है; तभी मनुष्य स्त्रियों को माता की एक एक मूर्ति देख सकता है ।"
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कई दिन हो गये, श्रीरामकृष्ण ने नारायण को कामिनी के सम्बन्ध में बहुत सावधान कर दिया था । कहा था - "स्त्रियों की हवा भी देह में न लगने पाये, मोटा कपड़ा देह में डाले रहना, कहीं ऐसा न हो कि उनके देह की हवा तेरे शरीर में लग जाय - और माता को छोड़कर दूसरी स्त्रियों से आठ हाथ, दो हाथ, नहीं तो कम से कम एक हाथ दूर जरूर रहना ।"
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श्रीरामकृष्ण - (मणि से) - उसकी माँ ने नारायण से कहा है - 'उन्हें देखकर हम लोग मुग्ध हो जाती हैं, तू तो भला अभी लड़का है ।’ और बिना सरल हुए कोई ईश्वर को पा नहीं सकता, निरंजन कैसा सरल है ?
मणि - जी हाँ !
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श्रीरामकृष्ण - उस दिन गाड़ी से आते समय कलकत्ते में तुमने देखा था या नहीं ? हर समय उसका एक ही भाव रहता है - सरल है । आदमी अपने घर में तो एक तरह के होते हैं, परन्तु जब बाहर जाते हैं, तब दूसरी तरह के हो जाते हैं । नरेन्द्र अब संसार की चिन्ता में पड़ गया है । उसमें कुछ हिसाबवाली बुद्धि है । सब लड़के क्या इसकी तरह कभी हो सकते हैं ?
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"आज मैं नीलकण्ठ का नाटक देखने गया था - दक्षिणेश्वर में नवीन नियोगी के यहाँ । वहाँ के लड़के बड़े दुष्ट हैं । वे सब इसकी उसकी निन्दा किया करते हैं । इस तरह की जगहों में भाव रुक जाता है ।
"उस बार नाटक देखते समय मधु डाक्टर की आँखों में आँसू देखकर मैने उनकी ओर देखा था । किसी दूसरे की ओर मैं नहीं देख सका ।"
(क्रमशः)

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