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*मूसा जलता देख कर, दादू हंस दयाल ।*
*मान सरोवर ले चल्या, पंखा काटे काल ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*दुर्जन का अंग १७१*
इस अंग में दुर्जन संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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दुर्जन१ दिल दर्पण सही२, नहीं दिखावै मांहिं ।
रज्जब मैला देख तौ, पल३ इत उत सो नांहि ॥१॥
दुष्ट१ का हृदय ठीक२ दर्पण के समान होता है । जैसे दर्पण दूसरों के दोष दिखाता है, अपनी पीठ पर लगे मैल को नहीं दिखाता किंतु देखने से पीछे मैल मिलेगा । वैसे ही दुष्ट अपने दोष छिपाता है और दूसरों के कहता है किंतु स्वयं मलीन हृदय होता है । वह क्षण३ भर भी दुष्टता से इधर उधर नहीं होता ।
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मुखपर१ मीठा बोलणा२, पस३ गीवत४ पर५ पिष्टि६ ।
रज्जब दुर्जन दोखजी७, दई८ न दिखाई दृष्टि९ ॥२॥
दुष्ट सन्मुख१ तो मधुर बोलता२ है परन्तु५ पीठ६ पीछे३ दुष्टता४ करता है अर्थात निन्दा करता है वास्तव में दुष्ट नारकी७ होता है । ईश्वर८ उसे हमारी आँखों९ के आगे न दिखावें ।
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रज्जब सर्प सिंह अजरी१, कमंध जीवत मूवौं२ मार ।
कंट केश जीमण सु जुध, दुर्जन दैत्य विचार ॥३॥
सर्प, सिंह, मक्खी१ और कमंध मरने२ पर भी जीवित को मारते हैं । मरे हुये सर्प की हड्डी का कांटा, मरे हुये सिंह के केश, मरी हुई मक्खी खाने से मारते हैं वा व्यथित करते हैं कमंध भी शिर कट जाने से मरा हुआ ही है किंतु युद्ध में सामने आने वालो को मारता है विचार करने पर वैसा ही दुर्जन है, वह भी मरता है तो तब दैत्य होकर मारता है ।
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रज्जब करगस१ रूप है, दुर्जन की औलादि२ ।
पंखौं पूतों३ रह गई, आदत४ बड हुं सु आदि५ ॥४॥
दुर्जन की संतान२ उल्लू१ रूप होती है । काक के पंखों से युक्त बाणों के तूणीर में एक भी उल्लू की पंखवाला बाण रख दिया जाय तो तूणीर के सब बाणों की पंखैं बेकार हो जाती हैं । उल्लू की काकों से नहीं बनती, वही स्वभाव४ उल्लू के पंखों मे रह जाता है । वैसे ही दुर्जन का स्वभाव उसके पुत्रों३ में रह जाता है वे भी दुर्जन के समान ही अन्यों को दु:ख देते हैं ? इस प्रकार दुर्जनों की संतानों में अपने से पूर्व५ के अपने बड़ों का स्वभाव रह जाता है ।
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सज्जन समै१ समान हैं, आवत करैं निहाल२ ।
दुर्जन दुहस३ दुकाल४ मय५, जब दीसै तब काल ॥५॥
सज्जन सुकाल१ के समान हैं । सुकाल आता है तब अन्नादि द्वारा सबको प्रसन्न२ करता है । वैसे ही सज्जन आते हैं तब सब को संतुष्ट ही करते हैं । दुर्जन असह्य३ दुकाल४ रूप५ है जब दुष्काल आता है, तब अन्नादि के अभाव से प्राणी काल के वश होते हैं । वैसे ही दुर्जन दिखाई देता है तब भी दु:ख ही देता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित दुर्जन का अंग १७१ समाप्तः ॥सा. ५१३६॥
(क्रमशः)

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