सोमवार, 8 नवंबर 2021

*उपजणि का अंग १६६(५/८)*

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*शूरा पूरा संत जन, सांई को सेवै ।*
*दादू साहिब कारणै, सिर अपना देवै ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*उपजणि का अंग १६६*
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शूर हिं क्या भरमाइये, सती न माने सीख ।
रज्जब उपजणि आपसे, भरैं विघ्न दिशि बीख१ ॥५॥
युद्ध में जाते हुये शूरवीर को मृत्यु भय द्वारा भ्रम में डालकर घर लौटा सकते हैं क्या ? सती भी तो घर पर लौटने की शिक्षा नहीं मानती । क्योंकि उनमें शौर्य और सतीत्व अपने से ही उत्पन्न हुये हैं किसी की शिक्षा से नहीं । इसलिये मृत्यु रूप विघ्न की ओर आगे ही पैर१ बढाते हैं । पीछे नहीं लौटते । वैसे ही आत्मानुभवी की वृत्ति विषयों की और नहीं लौटती, ब्रह्माकार ही रहती है ।
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मनिखा१ देही पायकर, लही ज्ञान गति२ मांहिं ।
जन रज्जब जिव जाप की, अह निशि या३ परि नांहिं ॥६॥
मनुष्य१ शरीर प्राप्त करके जब भीतर ज्ञान की अवस्था२ प्राप्त कर ली जाती है तब उस जीवात्मा के जप की क्रिया दिन या रात्रि के समय करना चाहिये, इस३ नियम पर नहीं रहती । उसकी तो वृत्ति प्रतिक्षण ब्रह्माकार ही रहती है ।
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जन रज्जब आतम उपज, शिशु शक्ति१ तिरै नीर ।
ज्यों बतक बच्चा मुर२, दिवस पानी पैरै३ वीर ॥७॥
पशु पक्षियों के बच्चे जल में अपनी उपज से ही तैरते हैं । जैसे बतक का बच्चा तीन२ दिन का ही जल पर तैरने३ लगता है । वैसे ही हे भाई ! जीवात्मा भी अपनी उपज से ही माया१ को तैर जाता है ।
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रज्जब देखो मीन सुत, तिरन सिखावै कौन ।
ऐसे उपजण आपसौ, गहै ज्ञान मग१ गौन ॥८॥
देखो, मच्छी के बच्चे को कौन तैरना सिखाता है ? वैसे ही जीवात्मा अपनी उपज से ही ज्ञान-मार्ग१ को ग्रहण करके उसमें गमन२ करता है ।
(क्रमशः)

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