गुरुवार, 18 नवंबर 2021

*लोक लज्जा का अंग १६८(१/४)*

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*जब दादू मरबा गहै, तब लोगों की क्या लाज?*
*सती राम साचा कहै, सब तज पति सौं काज ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*लोक लज्जा का अंग १६८*
इस अंग में लोक लज्जा संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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निगुरा नाकी को मरै, मत नाकी१ घट जाय ।
रज्जब नर कुंजर किये, नाक बधी लग जाय ॥१॥
जिस को गुरु का उपदेश नहीं प्राप्त होता है, ऐसा नर ही लोक लाज रूप नाक के लिये परिश्रम करता है कि - किसी प्रकार मेरी लज्जा१ न घट सके । ऐसे नर को उसकी वह भावना अगले जन्म में हाथी बनाती है जिससे उसकी नाक पैर तक बढ जाती है ।
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कर्म स्थानिक सब निर्ल्लज, धर्म स्थानिक लाज ।
जन रज्जब यहु जीव गति, क्यों करि सीझे काज ॥२॥
अपने स्वार्थ के काम रूप स्थान में तो लज्जा को त्याग देते हैं अर्थात अनर्थ करते हैं और धर्म के कार्य करने के स्थान में लज्जा करते हैं । प्राय: जीवों की यह चेष्टा रहती है, तब मुक्ति रूप कार्य कैसे सिद्ध हो सकता है ।
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लोक लाज लोई१ लिये, शंका सांकल घालि ।
रज्जब तोड़ै प्राणि पग, हरि दिशि सके न चालि ॥३॥
प्राणियों ने लोक लाज रूप कम्बली१ ओढ ली है और शंका रूप सांकल, भावना रूप पैरों मे डाल कर हरि की ओर जाने के भावना रूप पैर तोड़ डाले हैं इसलिये हरि की ओर नहीं चल सकते ।
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सुख सौं काणे१ काणि२ कुल, उघड़े३ उघड़ी४ ठौड़५ ।
जन रज्जब सब जगत का, लज्जा कीया चौड़६ ॥४॥
कुल की लज्जा२ के कारण प्राणी सुख से वंचित१ रहे हैं, फिर भी लज्जा खुलने४ के स्थान५ निर्लज्ज३ होना ही पड़ा । इस लोक लाज ने सब जगत का नाश किया है ।
(क्रमशः)

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