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*तुम हो तैसी कीजिये, तो छूटेंगे जीव ।*
*हम हैं ऐसी जनि करो, मैं सदके जाऊँ पीव ॥*
*तुम तैं तब ही होइ सब, दरश परश दर हाल ।*
*हम तैं कबहुं न होइगा, जे बीतहिं जुग काल ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥७ दास्य भक्ति॥*
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*॥ दास भक्त पर भगवान् की विशेष प्रीति ॥*
दास भक्त पर होत है, भगवत् प्रीति विशेष ।
गये अंक रैदास के, ताज के विप्र अशेष ॥१७९॥
दृष्टांत कथा – रैदासजी के पास भगवत् मूर्ती थी । ब्राह्मणों ने राजा से कहा – 'चमार जाति को भगवत् मूर्ती के पूजन का अधिकार नहीं । रैदास को दण्ड देना चाहिये और मूर्ति उससे ले लेनी चाहिये ।'
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अन्त में निश्चय हुआ कि भगवान् का सिंहासन रैदास और ब्राह्मणों के बीच में रख दिया जाय फिर वे दोनों उन्हें बुलावे । जिनके पास भगवान् स्वयं चले जाँय वे ही उन्हें ले जायें । वैसा ही किया गया । भगवान् उछल कर के रैदास की अंक(गोद) में जा बैठे । इससे सूचित होता है कि दास भक्त पर भगवान् की विशेष प्रीति होती है ।
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*॥ दास भक्त की निष्ठा ॥*
निज उपास्य सेवा तिहिं रति हित कर्म है ।
यह कर्तव्य दास का यही सु धर्म है ॥
दास भक्त चाहता नहिं मुक्ति स्वतंत्रता ।
परम सुखद तिहिं भासत स्वामी तंत्रता ॥
(सा ० सु ० वि ० २३ । २१६)

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