शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

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*दादू नीका नांव है, तीन लोक तत सार ।*
*रात दिवस रटबो करो, रे मन इहै विचार ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥८ सख्य भक्ति॥*
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जैसे मित्र न तजे सु प्रिय निज मित्र को ।
तिमि न तजे हरि आत्मा संग विचित्र को ॥
कहत सखापन संत 'नरायण' जानिये ।
बड़े भाग्य से मिले लोक में मानिये ॥
(सा ० सु ० वि ० २३ । २१७)
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*॥ सखा भक्त के रोम २ से नाम ॥*
सखा भक्त के निकलता, रोम रोम से नाम ।
सोते अर्जुन के सुना, कृष्ण कृष्ण अभिराम ॥१८०॥
दृष्टांत कथा – एक समय कैलास पर भगवान् शंकरजी भगवद्भक्तों के विषय में कुछ बातें कर रहे थे पार्वतीजी ने कहा – जिन भगवद्भक्तों की आप इतनी महिमा करते हैं, उनमें से किसी एक का तो दर्शन करावें ।'
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यह सुन कर शंकरजी देवीजी को साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये और शेई कृष्ण के सखा भक्त अर्जुनके द्वार पर जाकर द्वारपाल से पूछा – 'अर्जुन कहाँ हैं ?' द्वारपाल – 'सोये हुये हैं ।' उन्हें जगाने के लिये शंकरजी ने श्री कृष्ण का स्मरण किया । उद्धव, रुक्मणी और सत्यभामा के सहित श्रीकृष्णजी शंकरजी के पास आये । शंकरजी ने कहा – 'देवी उमा अभी अर्जुन के दर्शन करना चाहती हैं । आप उन्हें जगावें ।
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वे सब जाकर अर्जुन की शय्या के पास बैठे तो उन्हें अर्जुन के रोम २ से श्री कृष्ण २ सुनाई पड़ने लगा । कुछ देर होती देख कर देवी के सहित शंकर भी भीतर गये और देखा कि सब के सब अर्जुन के रोम २ से निकलने वाली ध्वनि को ध्यान लगा कर सुन रहे हैं । यह देख पार्वतीजी को बड़ा आश्चर्य हुआ । इससे सूचित होता है कि सखा भक्त का भगवत् चिन्तन सोते हुये भी बन्द न होकर रोम २ से होता रहता है ।

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