सोमवार, 29 नवंबर 2021

*साधक और स्त्री*

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*यहु मन अपना थिर नहीं, कर नहीं जानै कोइ ।*
*दादू निर्मल देव की, सेवा क्यों कर होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२) साधक और स्त्री*
श्रीरामकृष्ण प्रकृतिभाव की बातचीत कर रहे हैं । श्रीयुत प्रिय मुखर्जी, मास्टर तथा और भी कुछ भक्त बैठे हुए हैं । इसी समय ठाकुरों के यहाँ के एक शिक्षक ठाकुरों के कई लड़कों को साथ लेकर आये ।
श्रीरामकृष्ण - (भक्तों के प्रति) - श्रीकृष्ण के सिर पर मोरपंख रहता था, उसमें योनि-चिह्न होता है, इसका यह अर्थ है कि श्रीकृष्ण ने प्रकृति को सिर पर रखा था ।
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"कृष्ण रास-मण्डल में गये । परन्तु वहाँ खुद प्रकृति बन गये । इसीलिए देखो, रास-मण्डल में उनका प्रकृति-वेश है । स्वयं प्रकृतिभाव के बिना धारण किये कोई प्रकृति के संग का अधिकारी नहीं होता । प्रकृतिभाव के होने पर ही रास और सम्भोग होता है; परन्तु साधक की अवस्था में बहुत सावधान रहना पड़ता है ।
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उस समय स्त्रियों से बहुत दूर रहना पड़ता है । यहाँ तक कि भक्तिमती स्त्री होने पर भी उसके पास अधिक न जाना चाहिए । छत पर चढ़ते समय बहुत झूमना न चाहिए, क्योंकि इससे गिरने की सम्भावना है । जो कमजोर हैं, उन्हें दीवार के सहारे से चढ़ना पड़ता है । सिद्ध अवस्था की और बात है ।
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भगवान के दर्शन के बाद फिर अधिक भय नहीं रह जाता । तब बहुत कुछ निर्भयता हो जाती है । छत पर एक बार चढ़ना हुआ तो बस, काम सिद्ध है । छत पर चढ़कर फिर वहाँ चाहे कोई जितना नाचे । और देखो जो कुछ छोड़कर छत पर जाया जाता है, वहाँ फिर उसका त्याग नहीं करना पड़ता ।
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छत भी ईंट, चूने और मसाले से बनी और सीढ़ियाँ भी उन्हों चीजों से बनी हैं । जिस स्त्री के निकट इतनी सावधानी रखनी पड़ती है, ईश्वर-दर्शन के पश्चात् वही स्त्री साक्षात् भगवती जान पड़ती है । तब उसे माता समझकर उसकी पूजा करो, फिर विशेष भय की बात न रह जायेगी ।
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"बात यह है कि पाल छूकर फिर जो चाहे, करो ।
"बहिर्मुखी अवस्था में आदमी स्थूल देखता है । तब मन अन्नमय कोष में रहता है । इसके बाद है सूक्ष्मशरीर - लिंग शरीर । तब मनोमय और विज्ञानमय कोष में मन रहता है । इसके बाद है कारण शरीर । जब मन कारण शरीर में आता है, तब आनन्द होता है, मन आनन्दमय, कोष में रहता है । यह चैतन्यदेव की अर्धबाह्य दशा थी ।
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"इसके बाद मन लीन हो जाता है । मन का नाश हो जाता है । महाकारण में मन का नाश होता है । मन का नाश हो जाने पर फिर कोई खबर नहीं रहती । यह चैतन्यदेव की अन्तर्दशा थी ।
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“अन्तर्मुख अवस्था कैसी है, जानते हो ? दयानन्द*(*आर्य समाज के संस्थापक) ने कहा था, 'अन्दर आओ, दरवाजा बन्द कर लो ।' अन्दर हरएक की पहुँच नहीं होती ।
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"मैं दीपशिखा पर यह भाव आरोपित करता था । उसकी ललाई को कहता था स्थूल, उसके भीतर सफेद भाग को कहता था सूक्ष्म, और सबके भीतर वाले काले हिस्से को कहता था कारण-शरीर ।
(क्रमशः)

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