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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३०)*
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*१३०. (गुजराती) विनती । पंचमताल*
*तूँ ही तूँ तनि माहरे गुसांई,*
*तूँ बिना तूँ केने कहूँ रे ।*
*तूँ त्यां तूँ ही थई रह्यो रे,*
*शरण तुम्हारी जाय रहूँ रे ॥टेक॥*
*तन मन मांहि जोइये त्यां तूँ,*
*तुज दीठां हौं सुख लहूँ रे ।*
*तूँ त्यां जेटली दूर रहूँ रे,*
*तेम तेम त्यां हौं दुःख सहूँ रे ॥१॥*
*तुम बिन माहरो कोई नहीं रे,*
*हौं तो ताहरा वैण बहूँ रे ।*
*दादू रे जण हरि गुण गाता,*
*मैं मेलूँ माहरो मैं हूँ रे ॥२॥*
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भा० दी०-हे भगवन् ! मदीये शरीरेऽभ्यासवशात्त्वमेवाऽसि, त्वमेवासीति शरीरावयवेषु ध्वनिप्प्तोऽस्ति । त्वां विना "त्वां” शब्देन के पुरुष संबोधयामि ? अतीवस्नेहपात्रे त्वमितिशब्द प्रयुज्यते । मदीयान्त:करणवृत्तौ त्वमेव व्यापकरूपेण भाससे । अतस्तव शरणागतोऽस्मि । शरीरे मनसि बल्चि यत्र यत्र त्वां पश्यामि तत्र तत्र त्वमेव मे भाससे । त्वामेव दृष्ट्वा सुखमनुभवामि । त्वं तत्रासीति कथनमात्रेण यावहूरं भाससे तावदेव दुःखं जायते । त्वां विना न मेऽस्ति कोऽपिरक्षकः । त्वमेव मे सर्वस्वं अघुना सर्वदैव त्वदीयोऽस्मि अतो हरिगुणानुवादेन मिथ्याभूतमहंकारं विधूय स्वस्वरूपे स्थितोऽस्मि ।
उक्तहि दैवी भागवते–
अहो कृपा ते कथयाम्यहं किं त्रातस्त्वया यत्किल भक्तिहीनः ।
भक्तानुकम्पी सकलो जनोऽस्ति विमुक्तभक्तेरवनं ब्रतंते ।
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हे स्वामिन् ! मेरे शरीर में अभ्यास के कारण ‘तूं ही तूं’ ही ऐसी ध्वनि होती रहती है, क्योंकि मैं आपको त्वं शब्द से पुकारता हूं । अतः शरीर में भी ‘त्वमेवासि’ यह ध्वनि पैदा होती रहती है । जो अत्यन्त प्यारा होता है उसको ही त्वं शब्द से पुकारा जाता है । इससे आपका और मेरा अतिशय प्रेम ध्वनित होता है ।
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मेरी अन्तःकरण की वृत्ति में भी आप ही व्यापक रूप से प्रतीत हो रहे हैं । अतः मैं अब आपकी शरण में आ गया हूं । शरीर में मन में, जहां-जहां आपको देखता हूं, वहां-वहां पर आप ही नजर आते हैं । मैं आप को ही देख कर सुखी होता हूँ । तेरे बिना मेरा और कोई नहीं है । तू ही मेरा तो सर्वस्व है । मैं तो सदा तेरा ही हूं ।
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इसलिये हरि का गुणानुवाद गाकर अहंकार को नष्ट करके आपके स्वरूप में स्थित हो जाऊंगा । दैवीभागवत में –
अहो ! मैं आपकी कृपा की क्या महिमा वर्णन करूं ? क्योंकि आपने मुझ जैसे भक्तिहीन की भी आश्चर्य रूप से रक्षा की । हे मां ! अपने भक्त पर तो कृपा करने वाले अनेक होते हैं परन्तु भक्तिहीन की रक्षा करना तो आप का ही व्रत है ।
(क्रमशः)

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