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*दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद ।*
*संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥२९॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥ महाप्रसाद ॥*
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*॥ प्राण जाने की शंका होने पर भी भक्त महाप्रसाद को नहीं त्यागते ॥*
तजत न भक्त प्रसाद को, प्राण भले ही जाय ।
अंगद ने भोजन किया, भगवत् में मन लाय ॥१६६॥
दृष्टांत कथा – भक्त अंगदजी को एक युद्ध विजय में एक उत्तम हीरा मिला था । उनने उसे भगवान् जगदीश के चढ़ाने को रख लिया था । वह हीरा लेने के लिये राजा ने उनकी बहिन को लोभ देकर उनके भोजन में विष मिलाने के लिये तैयार किया । बहिन का पुत्र भी प्रति दिन अंगदजी के साथ ही जीमा करता था । जिस दिन भोजन में विष मिलाया उस दिन लड़के को कहीं भेज दिया । विष मिले भोजन का थाल अंगदजी आगे रक्खा ।
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अंगद ने भगवान् को भोग लगा कर लड़के को आवाज दी । बहिन ने कहा – 'वह तो कहीं चला गया है आप जीम लें ।' अंगद – 'नहीं, उसके आने पर ही जिमूंगा ।' अपने पुत्र पर इतना प्रेम देख कर बहिन रो पड़ी और भोजन का थाल उठाने लगी । अंगद – 'यह क्या करती हो !' बहिन ने सब बात साफ़ २ कह दी और अपराध क्षमा करें, यह भोजन आप नहीं जीमें ।' यह कह कर फूट २ कर रोने लगी ।
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अंगद – 'बहिन ! जो कुछ हुआ ठीक है तुम्हें सब प्रकार क्षमा ही है, अब लड़के को मत बुलाओ इस भोजन रूप महाप्रसाद को मैं नहीं त्याग सकता । भला मैनें भगवान् को तो विष मिला भोजन का भोग लगा दिया अब अपने प्राणों के लोभ से कैसे छोड़ सकता हूँ । वे उस भोजन को पाकर अपने कमरे में जाकर भजन में बैठ गये । फिर तो क्या था उस विष का कुछ भी प्रभाव उन पर नहीं पड़ा । इससे सूचित होता है कि प्राण जाने की शंका होने पर भी भक्त जन महाप्रसाद का त्याग नहीं करते ।

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