शनिवार, 11 दिसंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१४०

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१४०)*
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*१४०. (गुजराती) अधीर उलाहन । त्रिताल*
*धरणीधर बाह्या धूतो रे,*
*अंग परस नहिं आपे रे ।*
*कह्यो अमारो कांई न माने,*
*मन भावे ते थापे रे ॥टेक॥*
*वाही वाही ने सर्वस लीधो,*
*अबला कोइ न जाणे रे ।*
*अलगो रहे येणी परि तेड़े,*
*आपनड़े घर आणे रे ॥१॥*
*रमी रमी रे राम रजावी,*
*केन्हों अंत न दीधो रे ।*
*गोप्य गुह्य ते कोई न जाणै,*
*एह्वो अचरज कीधो रे ॥२॥*
*माता बालक रुदन करंता,*
*वाही वाही ने राखे रे ।*
*जेवो छे तेवो आपणपो,*
*दादू ते नहिं दाखे रे ॥३॥*
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भा० दी०-जगदाधारण प्रभुणा वयं वञ्चिता: यतस्तेनास्माकं मनसि स्वमायया मायिकपदार्थे-ध्वेव रतिर्जनिता । अतो वञ्चिताः सन्तो मुग्धा जाताः । तेन स्वस्वरूपं त्वंशेनापि न दर्शितम् । न चास्पदुक्तं वचनमुररीकरोति स तु स्वमन:प्रियं कार्य विधत्ते । अस्मान् वञ्चयित्वास्माकं सर्वस्वमपहृतवान् । न च निर्बलानप्यङ्गीकरोति । स्वयं जीवह्रदये वसन्नपि तेषां मन: सांसारिकविषयष्वेव प्रलोभ्य तेष्वेव विषयेषु रमयति । अतस्ते सांसारिकविषयासक्ता जाताः ।
अस्माभिः सह क्रीडन्नस्मान् प्रसन्नीकरोति । परन्तु दर्शनं न ददाति । स च हृदयगुहां प्रविष्टो विलीयते तत्रैव न च कोऽपि तस्यान्तं वेत्ति इति महदाश्चर्यम् । यथा माता बालकं बोधयन्ती प्रसादयति तथा भगवानपि जीवान् मायया मोहयन् वशीकरोति । वास्तविकं तात्त्विकं स्वरूपं कस्मैचिदपि न दर्शयति । यावद्धि भेददृष्टिस्तावन्नाद्वैतज्ञानं जायते । अद्वैतज्ञाने जाते तु भेदनिवृत्त्या कः कं भेदेन पश्येत् ।
उक्तं वेदान्तसंदर्भे मनोलयप्रकरणे-
देहमध्ये स्थितं ब्रह्म कथं मूढ न पश्यसि
वाचा जल्यो वृथाऽयं तु निःशब्दं ब्रह्म उच्यते ॥
माया ब्रह्म कथं भिन्नं सूर्यरश्मी तथैव च
पुष्पगन्धं कथं भिन्नं जलतरङ्गं तथैव च ॥
ब्रह्मरूपमिदं सर्वं ब्रौवाहं न संशयः
मनोलयं भवेद् ब्रह्म बह्ममूलमिदं जगत् ॥
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इस पृथ्वी को धारण करने वाले परमात्मा ने हम सब को ठग रखा है । क्योंकि उन्होंने अपनी माया के द्वारा हमारे मन में मायिक पदार्थों से ही प्रेम पैदा कर रखा है । इसलिये हम सब ठगे गये । अपना स्वरूप तो अंशांश भी किसी को नहीं दिखलाते और हमरी प्रार्थना भी नहीं सुनते हैं । वे प्रभु अपने मन की ही करते हैं ।
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हमारे मन को ठग कर हमारा सर्वस्व हरण कर लिया । निर्बलों पर भी ध्यान नहीं देते । जीवों के हृदय में रहते हुए भी स्वयं अलग रह कर जीवों के मन में विषयों की ही प्रेरणा करते हैं । अतः जीवों का मन विषयों में ही आसक्त रहता है । हमारे साथ क्रीड़ा करते हुए सब को प्रसन्न करते हैं परन्तु अपना स्वरूप किसी को भी नहीं दिखाते हैं । स्वयं हृदय-गुहा में गुप्त ही रहते हैं । उनके आदि, अन्त को कोई नहीं जान सकता किन्तु वे प्रभु सब को जानते हैं ।
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यह ही सबसे बड़ा आश्चर्य है । जैसे माता बालक को प्रसन्न करती हैं, ठगती है, उसको कुछ देती नहीं, ऐसे ही भगवान् भी अपनी माया से जीवों को ठगते हैं, अपना वास्तविक स्वरूप किसी को भी नहीं दिखलाते । भाव यह है कि जब तक भेद-दृष्टि रहती है, तब तक अद्वैत-ज्ञान नहीं होता और अद्वैत-ज्ञान होने पर जीव-ब्रह्म का ऐक्य होने से कौन किसको देखे ?
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वेदान्तसंदर्भ में लिखा है कि-
नाम रूपात्मक सारी सृष्टि वाणी का ही विकार है, ब्रह्म तो निःशब्द है । अतः हे मूढ देह में स्थित उस ब्रह्म को क्यों नहीं देखता ?
जैसे सूर्य और उसकी किरणों में, पुष्प और गन्ध में, तथा जल और उसकी तरंगों में नाम मात्र का भेद प्रतीत होता है, वास्तव में सूर्य और किरण, पुष्प और गन्ध, जल और तरंग एक ही है । ऐसे मायाब्रह्म का भेद भी काल्पनिक ही है । अतः सब कुछ ब्रह्म ही है और तुम भी निःसंशय ब्रह्म ही हो । अतः अपने मन को जीतो, मन को जीतने पर सब कुछ ब्रह्म ही दिखता है । कारण कि मन से भेद पैदा होता है, मन के जीतने पर सब ब्रह्म ही प्रतीत होता है और ब्रह्ममूलक जगत् होने से भी यह जगत् ब्रह्ममय ही है ।
(क्रमशः)

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