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*सब गुण सब ही जीव के, दादू व्यापैं आइ ।*
*घट मांहि जामैं मरै, कोइ न जाणै ताहि ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*क्रोध का अंग १७३*
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गोष्ठी१ गोरख दत्त की, जन रज्जब जग जोग ।
तिन हुं चमकि चक्कर चले, तो क्षमा करेगा कोय ॥१३॥
गोरक्षनाथ और दत्तात्रेय जैसे महापुरुषों की वार्तालाप१ में भी क्रोध द्वारा चमक कर एक दूसरे के विपरीत चक्कर चले हैं तब कहो, क्षमा कौन करेगा ?
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अवतार हुं अहंकार की, हुई सबन बिच बात ।
रज्जब देखो दशों दिशि, कहु किन छोड़ी घात ॥१४॥
अहंकार पूर्वक क्रोध की बात सब अवतारों के जीवन में भी आई हुई ज्ञात होती है । दश अवतारों की और देखो और कहो, किसने मारना तथा अन्यों का अहित करना छोड़ा है ।
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रावणि१ मार्या लक्ष्मण, लंका दही हनुमंत ।
रज्जब उभय अनंग२ जित, कहिये साधु३ संत ॥१५॥
लक्ष्मण ने मेधनाद१ को मारा था और हनुमान ने लंका को जलाया था । दोनों ही संतों द्वारा काम२ को जीतने वालो में श्रेष्ठ३ कहे जाते हैं किंतु क्रोध तो उनमें भी था ही । अत: क्रोध जतियों को भी नहीं छोड़ता ।
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जीवित ज्वाला में रह्या, मुवै मसाणहु आगि ।
जन रज्जब अति क्रोध फल, रावण तरुवर लागि ॥१६॥
रावण जीवित तो क्रोध की ज्वाला में ही रहा अर्थात मार काट करता रहा और मरने पर भी श्मशान में अग्नि से जलता ही रहता है । प्रतिवर्ष दशहरे को उसे जलाते हैं वा ऐसा भी सुनते हैं कि - रावण के श्मशान के स्थान में सदा अग्नि जलता रहता है । रावण रूप वृक्ष के अति क्रोध का यही फल लगा है कि - सदा जलता रहता है ।
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रज्जब पाके क्रोध की, महिमा सुनो सु कान ।
मिल१ तामस२ ताखा३ हुआ, अग्नि अखण्डित ठान४ ॥१७॥
पके हुये क्रोध की महिमा भी अपने कानों से सम्यक सुनो, पके हुये क्रोध२ से मिला१ है अर्थात धारण किया है, वह प्राणी तक्षक३ जाति का सर्प हुआ है और सदा विषाग्नि अपने में स्थिर रखता४ हुआ जलता रहता है ।
(क्रमशः)
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