रविवार, 12 दिसंबर 2021

*कष्ट परै जब कौन निवारै*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
🌷🙏🇮🇳 *#भक्तमाल* 🇮🇳🙏🌷
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*आदि अंत लौं आय कर, सुकृत कछू न कीन्ह ।*
*माया मोह मद मत्सरा, स्वाद सबै चित दीन्ह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*भोजन भौत प्रकार करावत,*
*संत समू१ चलि आवत द्वारै ।*
*वैन सुने तिय मांहि विनै दुख,*
*होय दयालु हि राखत बारै ॥*
*मोर धणी लखि तोर धणी पिख,*
*कष्ट परै जब कौन निवारै ।*
*लेपन झारन टैल करो रहि,*
*अन्न मिलै दृग चालत धारै ॥१९५॥*
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केवल कूबाजी के यहां प्रतिदिन अनेक प्रकार के भोजन भगवान् के लिये बनते थे । संतों का समुदाय१ भी आपके द्वार पर आता ही रहता था ।
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आपने उस स्त्री के दुःख और दीनता से भरे वचन सुने तब दयालु होकर बोले – अरि मूर्ख ! देख, मेरे पति का प्रभाव, कैसा आनन्द हो रहा है और अपने पति को भी देख, कैसी कठिनता में पड़ा है ।
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जब दुःख पड़ता है तब कौन मिटाता है ? मेरा स्वामी ही मिटाता है ।
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अच्छा अब बाहर रहो और लेपन तथा झाडू लगाया करो, तुम सब को खाने के लिये अन्न मिलता रहेगा । आपकी महिमा देखकर भाग्यहीन के नेत्रों से अश्रु धारा चलने लगी ।
(क्रमशः)

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