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*आत्मा राम है, राम है आत्मा,*
*ज्योति है युक्ति सौं करो मेला ।*
*तेज है सेज है, सेज है तेज है,*
*एक रस दादू खेल खेला ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद. २८६)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(४)भक्तियोग और कर्मयोग । ज्ञान का लक्षण*
सींती के पण्डितजी चले गये हैं । सन्ध्या हो गयी । काली मन्दिर में देवताओं की आरती होने लगी । श्रीरामकृष्ण देवताओं को प्रणाम कर रहे हैं । छोटी खाट पर बैठे हुए हैं, मन ईश्वर-चिन्तन में है । कुछ भक्त आकर जमीन पर बैठ गये । घर में शान्ति है ।
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एक घण्टा रात बीच चुकी है । ईशान मुखोपाध्याय और किशोरी आये । वे लोग श्रीरामकृष्णदेव को प्रणाम कर बैठ गये । पुरश्चरण आदि शास्त्रोक्त कर्मों पर ईशान का बड़ा ही अनुराग है । वे कर्मयोगी हैं । अब श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - ज्ञान ज्ञान कहने ही से कुछ थोड़े ही होता है ? ज्ञान के दो लक्षण हैं । पहला है अनुराग, अर्थात् ईश्वर को प्यार करना । केवल ज्ञान का विचार कर रहे हैं, परन्तु ईश्वर पर अनुराग नहीं है, प्यार नहीं है तो वह मिथ्या है ।
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एक और लक्षण है - कुण्डलिनी शक्ति का जागना । कुण्डलिनी जब तक सोती रहती है, तब तब ज्ञान नहीं होता । बैठे हुए पुस्तकें पढ़ते जा रहे हैं, विचार कर रहे हैं । परन्तु भीतर व्याकुलता नहीं है, वह ज्ञान का लक्षण नहीं है । कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर भाव, भक्ति और प्रेम यह सब होता है । इसे ही भक्तियोग कहते हैं ।
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"कर्मयोग" बड़ा कठिन है, उससे कुछ शक्ति होती है, विभूतियों मिलती हैं ।”
ईशान - मैं हाजरा महाशय के पास जाता हूँ ।
श्रीरामकृष्ण चुप हैं । कुछ देर बाद ईशान फिर कमरे में आये, साथ साथ हाजरा भी थे । श्रीरामकृष्ण चुपचाप बैठे हुए हैं । कुछ देर बाद हाजरा ने ईशान से कहा - “चलिये, अभी ये ध्यान करेंगे ।" ईशान और हाजरा चले गये ।
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श्रीरामकृष्ण चुपचाप बैठे हुए हैं । कुछ समय में सचमुच ध्यान करने लगे । उँगलियों पर जप कर रहे हैं । वही हाथ एक बार सिर पर रखा, फिर ललाट पर, फिर क्रमशः कण्ठ, हृदय और नाभि पर ।
भक्तों को जान पड़ा, श्रीरामकृष्ण षट्पद्मों में आदि-शक्ति का ध्यान कर रहे हैं । शिवसंहिता आदि शास्त्रों में जो योग की बातें हैं, क्या वे यही है ?
(क्रमशः)
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