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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ६१/६४*
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खोसै अंदर तुखम८ हरि, आतसि९ अंदर दूद ।
कहि जगजीवन असली बंदा, आसिक अल्लह सूद ॥६१॥
{८. तुखम=तुख्म(=बीज)} {९. आतसि=आतश(अग्नि)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जैसा बीज बोयेंगे अन्तर की उष्णता उसे वैसा ही उगायेगी या उद्भासित करेगी । संत कहते हैं कि जो बंदा दृढ़ निश्चयी है वह सदा अल्लाह या ईश्वर के पथ से डोलेगा नहीं ।
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सूद सुदन सुदन सूद, गरम नरम गुण दोइ ।
कहि जगजीवन नांम भज्यां, उभै एक कर जोइ ॥६२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि शीतल उष्ण ये दो ही गुण स्वभाव है । जो स्मरण करते हे उनके लिये दोनों एक ही है ।
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तृण सम यहु तन नां भया, अरथ लगावत रांम ।
कहि जगजीवन तूल१० तन, उडि गया बेकाम ॥६३॥
(१०. तूल=रुई)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह देह तिनके जैसी ना हो पाई अगर इसम़े प्रभु विरह होता तो यह सूख कर तिनका हो गयी होती । और फिर प्रभु इसे किसी योग्य बना देते । यह तो रुई सा हुआ । जो बहु विस्तार लेता हुआ भी व्यर्थ ही संसार में भटक भटक कर उड़गया ।
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केइ सरप बिच्छी किया, केइ नाहर११ केइ स्वांन१२ ।
कहि जगजीवन ब्रह्म ग्यांन तजि, चित मंहि बरतत आंन ॥६४॥
(११. नाहर=सिंह) {१२. स्वांन=श्वान(=कुत्ता)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अपनी अपनी मति वृत्ति से जीव कभी सर्प हुआ । कभी बिच्छू कभी सिंह तो कभी श्वान हुआ । ऐसा इस कारण हुआ कि जीव ने ब्रह्म ज्ञान छोड़कर सहज उपायों को जो अस्थायी है को अपने चित्त में स्थान दिया है ।
(क्रमशः)
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