सोमवार, 6 दिसंबर 2021

*२१. बिचार कौ अंग ~ ४९/५२*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ४९/५२*
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भूमि पराई आपणी, आंगुल आंगुल माप ।
कहि जगजीवन रांम रटि, हरिभज बंधन काप ॥४९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव संग्रह वृति में इतना लगा है की एक एक अंगुली से भूमि का नाप कर तेरी मेरी करता है । इससे श्रेष्ठ तो हे जीव तू भजन कर जिससे तेरी भव बेड़ी कटेगी और तू मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त होगा ।
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उभै पंथ अम्रित स्त्रवै, सब पंथनि सिर ताज ।
कहि जगजीवन प्रिथिवि पर, रांम कहै रस काज ॥५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि दोनों पंथ द्वैत व अद्वैत से अमृत बरसता है और वे ही अपने अपने साधकों के लिये श्रेष्ठ है । इस पृथ्वी पर कल्याण तो राम नाम कहने से ही होगा ।
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रांम भगति बिन दूसरी, बात सुण्यां अस दोस ।
अनभै२ सावण की बिरखा, आंन कथा जस वोस२ ॥५१॥
{२=२. अनभै=सन्तों की अनुभव वाणी श्रावणमास की वर्षा के समान हितकर है । इसके अतिरिक्त सांसारिक लोगों की बातों को ओस(रात्रि में शीत के कारण गिरने वाले जल बिन्दु) के समान समझना चाहिये ॥५१॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि संतो की अनुभव वाणी सावन मास की कथा के समान हितकर है । बाकि संसारिक लोगों के वक्तव्य औस बूंदो के समान क्षणिक हैं ।
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सुमिरण मेरे साधना, आरंभ अनभै नांम ।
कहि जगजीवन भगति हरि, रोम रोम धुनि रांम ॥५२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाम स्मरण ही मेरी साधना है । जिसका आरम्भ मैं अनुभव वाणी से करता हूं मेरी भक्ति रोम रोम में सरि नाम स्मरण ही है उस प्रभु के नाम की धुन लगी रहनी चाहिए ।
(क्रमशः)

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