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*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*द्वारवती चलि छाप धरैं भुज,*
*जान न दें प्रभु धाम फिराये ।*
*सन्तन की नित टैल१ करो,*
*उर भाव धरो करिहूं तव भाये ॥*
*धाम हि शंख रु चक्र गदांबुज,*
*चिन्ह भये भुज देख रिझाये ।*
*सागर गोमति संग रह्यो सुन,*
*मालहि मेल्हि रु दोय मिलाये ॥१९२॥*
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केवल कूबाजी की इच्छा हुई कि द्वारकाजी चल कर शंख, चक्रादिक की छाप भुजा पर लगा आऊं किन्तु भगवान् ने जाने से रोक दिया और ...
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पीछे अपने धाम पर ही जाने की आज्ञा देते हुये कहा – तुम हृदय में दृढ़ भाव रखते हुये नित्य संतों की सेवा१ करो । तुम जो भी हृदय में इच्छा करोगे, वह तुम्हारी मनोभावना के अनुसार ही मैं पूर्ण कर दूंगा ।
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भगवान् की आज्ञा मानकर पीछे ही घर चले आये । फिर धाम में भगवान् जानरायजी के पास ही आपकी भुजा में शंख, चक्र, गदा और कमल के चिन्ह हो गये । आप भुजा को देखकर अति प्रसन्न हुये ।
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गोमती और समुद्र के बीच में रेती है, समुद्र की लहर आने से दोनों का संगम हो जाता है । एक समय लहर आना और संगम होना बन्द हो गया । केवल कूबाजी ने सुना कि संगम नहीं होने से माहात्म्य की हानि हो गई है और रेती उड़ने से वहां के लोगों को भी दुःख हो गया है । तब आपने राम नाम स्मरण करने की अपनी माला भेजते हुये कहा – यह दोनों के बीच में रख देना । रख देने से पूर्ववत ही संगम होने लग गया था ।
(क्रमशः)

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