रविवार, 5 दिसंबर 2021

*क्रोध का अंग १७३(१/४)*

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*दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार ।*
*रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*क्रोध का अंग १७३*
इस अंग में क्रोध संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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क्रोध काल कहिये सदा, अंतक१ है अहंकार ।
जन रज्जब जोरै२ जुलम३, पाया भेद४ विचार ॥१॥
क्रोध को सदा काल रूप ही कहा जाता है, अंहकार भी काल१ रूप है । दोनों ही जोर२ का अर्थात बड़ा अन्याय३ करने वाले हैं हमने इनका रहस्य४ विचार द्वारा जान लिया है ।
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रज्जब अंतर१ आतमा, अंतक२ है अहंकार ।
प्राणी परलै३ पिशुनता४, होत न लागै बार५ ॥२॥
अहंकार आंतर१ आत्मा के लिये काल२रूप ही है । अहंकार से प्राणी में दुष्टता४ आती है और दुष्टता से नाश३ होने में कुछ समय५ नहीं लगता, शीघ्र नष्ट हो जाता है ।
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क्रोधी डरै न कलंक तैं, मारै माता बाप ।
बहिन विहरि१ बंधु बधै, पिशुन२ न पेखै३ पाप ॥३॥
क्रोधी मनुष्य कलंक से नहीं डरता, माता पिता को भी मार देता है बहिन को विदीर्ण१ करता है, बन्धुओं का वध करता है, वह दुष्ट२ पाप को नहीं देखता३ ।
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गुरु शिष राजा चाकर१ हु, तामस२ तन तिन काल ।
रज्जब रीति न रोस में, कहिये क्रोध चण्डाल ॥४॥
गुरु शिष्य, राजा, नोकर१, कोई भी हो, यदि शरीर में क्रोध२ है तो उसका काल ही है वा क्रोधी शिष्य और क्रोधी नोकर गुरु और राजा के काल हैं वैसे ही क्रोधी गुरु, और क्रोधी राजा शिष्य और नोकर के काल हैं । क्रोध के समय गुरु शिष्यादि की रीति नीति नहीं रहती । इसलिये क्रोध को चण्डाल कहते हैं ।
(क्रमशः)

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