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*हरि सुमिरण सौं हेत कर, तब मन निश्चल होइ ।*
*दादू बेध्या प्रेम रस, बीष न चालै सोइ ॥*
*जब अंतर उरझ्या एक सौं, तब थाके सकल उपाइ ।*
*दादू निश्चल थिर भया, तब चलि कहीं न जाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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*साभार ~ बाबू लाल शर्मा बौहरा*
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सक्षम धीर समर्थ हो, दिव्य गुणी प्रतिहार ।
गुरु दादू करिए कृपा, मैं मति मन्द गँवार॥
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सच में कृपा दयाल की, भरती भक्ति उमंग ।
मिले नेह सद्ज्ञान फिर, भाव सृजन सत्संग ॥
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साधु पंथ शुभ धर्महित, जनजीवन कल्याण ।
गुरु दादू करिए कृपा, सुफल मनोरथ प्राण ॥
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हरि दर्शन सत्संग हित, साधक सेतु समान ।
गुरु दादू करिए कृपा, दो निर्मल मति ज्ञान ॥
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मन निर्मल तन स्वस्थ हो, उत्तम विज्ञ विचार।
गुरु दादू करिए कृपा, सुन प्रभु भक्त पुकार॥
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संत मिलन सौभाग्य से, 'विज्ञ' धर्म इहलोक।
गुरु दादू करिए कृपा, हो मनुजात अशोक॥
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सत्य सृजन सद् आचरण, करें संत सत्संग ।
गुरु दादू करिए कृपा, जन मन नवल उमंग ॥
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मन मंथन रुकता नहीं, बढ़ता भाव विकार ।
गुरु दादू करिए कृपा, करूँ स्वप्न साकार॥
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मन के मते हजार है, सीमित कायिक शक्ति ।
गुरु दादू करिए कृपा, हो प्रशस्त पथ भक्ति ॥
✍©
बाबू लाल शर्मा बौहरा, विज्ञ
निवासी - सिकन्दरा, दौसा
राजस्थान ३०३३२६

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