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*धरती अम्बर रात दिन, रवि शशि नावैं शीश ।*
*दादू बलि बलि वारणें, जे सुमिरैं जगदीश ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रेत निकारिके जाय लिये पग,*
*देख सबै अति अचरज आयो ।*
*व्योर१ लख्यो जल कुंभ पिख्यो तन,*
*कूब नख्यो२ हरि को इमि भायो ॥*
*ल्यावत धाम कहैं धनि राम,*
*पुमान रु वाम भले यश गायो ।*
*आय जुरयो् बहु लोग उमंग रु,*
*भाव भयो उस माल चढ़ायो ॥१९०॥*
खोदने वाले लोगों ने रेता निकाल कर उनके चरण छूये । उनके दर्शन से सब को बड़ा आश्चर्य हुआ ।
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फिर खोजकर पता लगाने१ पर उन्होंने एक जल का भरा हुआ घड़ा देखा और केवलजी के शरीर पर कूब – पड़ा२ हुआ भी देखा । हरि की ऐसी ही इच्छा थी ।
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फिर ग्राम के सभी स्त्री, पुरुष राम नाम की ध्वनि करते हुये उनको उनके घर लाये और सम्यक् प्रकार उनका यशोगान किया ।
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फिर हर्ष की उमंग से भरे हुये बहुत-से लोग केवल कूबाजी के दर्शन के लिये आये । सब के हृदय में भगवद्भाव और भक्त सम्बन्धी भाव उत्पन्न हुआ । तब सबने श्रद्धा पूर्वक केवल कूबाजी को मालायें पहनाई ।
(क्रमशः)

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