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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२१. बिचार कौ अंग ~ ४१/४४*
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उत्तर : निस दिन थैं दीरघ हरि, भगति सिरोमणि भाव ।
कहि जगजीवन नीर करि, रांम रचि ए नांव ॥४१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि रात दिवस से प्रभु बड़े हैं । और सबसे श्रेष्ठ भक्ति भाव है । और प्रभु ने जल बना कर राम नाम की नाव बनायी है । यह पूर्व की साखी का उत्तर है ।
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कहि* जगजीवन मां त्रिया, एक धाम विसराम ।
जोगी हरिरत माइ कहै, भोगी भ्रमै सकाम* ॥४२॥
{*=*. किसी घर में नारी रूप से दो स्त्रियाँ है=एक माता एवं दूसरी पत्नी । उस घर में(भिक्षा के लिये) आने वाला सन्त उन दोनों को ही 'माता' शब्द से सम्बोधित करता है; परन्तु उस घर का उपभोक्ता स्वामी, सांसारिक भ्रम के कारण, एक को 'माता' तथा दूसरी को 'पत्नी' कह कर सम्बोधित करता है ॥४२॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि एक ही घर में दो स्त्रियां हैं, जो प्रभु साधना म़े लगे जोगी है वे दोनों को माँ बोलते हैं । और संसारी जीव भ्रमक्षवश एक को माता व एक को पत्नी कह व्यवहार करते हैं ।
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बेटी बहिन घर मैं बैरी, रांम बिमुख नर नारि ।
कहि जगजीवन त्रिगुणी बहणी५, जाल किया तन छारि*॥४३॥
{५. बहणी=वह्रि(अग्नि)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बहन बेटी जिस घर में राम विमुख जन है उन्हें तो वे भार स्वरूप शत्रु लगती है व इसी अग्नि में दाह से वे जन अपनी देह को राख कर देते है यह दाह विषय जनित है ।
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यूं* मस्तक रखि स्वांन वृत्ति६, जब लगि भजै न रांम ।
कहि जगजीवन हरि भगति, लहै न निहचल ठांम* ॥४४॥
{*=*. जैसे कोई कुत्ता जाग्रतवस्था में स्वामी के घर की सावधानी से रक्षा करता है; उसी प्रकार साधक भी जब तक जाग्रत रहता हुआ हरिभजन में निरन्तर नहीं लगा रहता, तब तक उस की भक्तिसाधना निश्चल स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाती ॥४४॥}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव कुत्ते की भांति साधना में रत हो प्रभु का भजन तब तक करता है जब तक कि भक्ति साधना की निश्चल स्थिति को प्राप्त न हो । यह उस भांति ही है जेसे कुत्ता जाग्रत अवस्था में कभी भी स्वामी का हित छोड़ अन्य किसी बात का ध्यान नहीं करता है ।
(क्रमशः)

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