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*दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे ।*
*बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥९ आत्म निवेदन भक्ति॥*
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*॥ आत्म निवेदक हरि इच्छा में प्रसन्न ॥*
आत्म निवेदक खुस रहे, हरि इच्छा के मांहि ।
दास नारायण गठरि ले, चले करी नाहिं नाहिं ॥१९३॥
दृष्टांत कथा – मथुरा में भक्त नारायणदासजी मन्दिर के बाहर खड़े यात्रियों के जूतों की रक्षा कर रहे थे । उन्हें एक व्यक्ति ने कहा – 'मेरी गठरी शिर पर रखले और मेरे साथ चल ।' नारायणदासजी ने शिर पर गठरी रखली और उसके साथ हो लिये । आगे एक परिचित व्यक्ति मिला और दौड़ करके नारायणदासजी के चरणों में गिर पड़ा तथा बोला – 'यह क्या ?' नारायणदासजी – 'भगवान् की इच्छा ही अपनी इच्छा है । यह शरीर भगवत् के ही समर्पण है, वे जो करावें वही इसे सहर्ष करना चाहिये ।' गठरी वाला व्यक्ति यह देख कर चरणों में पड़ कर क्षमा माँगने लगा और उन्हीं का भक्त बन गया । इससे सूचित होता है कि आत्म निवेदक हरि इच्छा में ही प्रसन्न रहते हैं ।

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