रविवार, 5 दिसंबर 2021

*भाव का विषय*

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*दादू मनसा वाचा कर्मना, हिरदै हरि का भाव ।*
*अलख पुरुष आगे खड़ा, ताके त्रिभुवन राव ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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सींती के ब्राह्मण कमरे में आये, श्रीरामकृष्ण को उन्होंने प्रणाम किया । उन्होंने काशी में वेदान्त पढ़ा था ।
श्रीरामकृष्ण - क्यों जी, तुम कैसे हो ? बहुत दिन बाद आये ।
पण्डित - (सहास्य) - जी, गृहस्थी के काम से छुट्टी नहीं मिली, आप तो जानते ही हैं ।
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पण्डितजी ने आसन ग्रहण किया । उनसे बातचीत हो रही है ।
श्रीरामकृष्ण - बनारस तो बहुत दिन रहे, क्या क्या देखा कुछ कहो तो, कुछ दयानन्द की बातें बताओं ।
पण्डित - दयानन्द से मुलाकात हुई थी । आपने तो देखा ही था ?
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श्रीरामकृष्ण - मैं देखने के लिए गया था । तब उस तरफ के एक बगीचे में वह टिका हुआ था । उस दिन केशव सेन के आने की बात थी । वह चातक की तरह उनके लिए तरस रहा था । बड़ा पण्डित है । बंगभाषा को 'गौराण्ड' भाषा कहता था । देवता को मानता था । केशव नहीं मानता था । दयानन्द कहता था, ईश्वर ने इतनी चीजें बनायीं और देवता क्या नहीं बना सकते थे ? निराकारवादी है । कप्तान 'राम राम’ कह रहा था, उसने कहा इससे 'बर्फी वर्फी' क्यों नहीं रटते ?
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पण्डित - काशी में पण्डितों के साथ स्थानन्द का खूब शास्त्रार्थ हुआ । सब एक तरफ थे और वह एक तरफ । फिर लोगों ने उसे ऐसा बनाया कि भागते बन पड़ी । सब एक साथ ऊँची आवाज से कहने लगे - 'दयानन्देन यदुक्तं तद्धेयम् ।'
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"और कर्नल अलकट को भी मैंने देखा था । वे लोग कहते हैं, महात्मा भी हैं । और चन्द्रलोक, सूर्यलोक, नक्षत्रलोक ये भी सब हैं । सूक्ष्म शरीर उन सब स्थानों में जा सकता है - इस तरह की बहुत सी बातें कहीं । अच्छा महाराज, यह विचार आपको कैसा जान पड़ता है ?"
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श्रीरामकृष्ण - भक्ति ही एकमात्र सार वस्तु है - ईश्वर की भक्ति । वे क्या भक्ति की खोज करते हैं ? अगर ऐसा हो, तो अच्छा है । अगर ईश्वरलाभ उनका उद्देश्य हो तो अच्छा है । चन्द्रलोक, सूर्यलोक, नक्षत्रलोक और महात्मा को लेकर ही अगर कोई रहे, तो ईश्वर की खोज इससे नहीं होती । उनके पाद-पद्मों में भक्ति होने के लिए साधना करनी चाहिए, व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए । अनेक वस्तुओं से मन को खींचकर उनमें लगाना चाहिए ।"
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यह कहकर श्रीरामकृष्ण रामप्रसाद के गीत गाने लगे –
मन ! अंधेरे में पागल की तरह उनके तत्त्व का विचार तुम क्या करते हो ? वह तो भाव का विषय है, भाव के बिना अभाव के द्वारा क्या वह कभी मिल सकता है ? उस भाव के लिए योगीजन युग-युगान्तर तक तपस्या किया करते हैं । भाव का उदय होने पर वह मनुष्य को उसी तरह पकड़ता है जैसे लोहे को चुम्बक पत्थर ।
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"और चाहे शास्त्र कहो, चाहे दर्शन कहो, चाहे वेदान्त, किसी में वे नहीं हैं । उनके लिए प्राणों के विकल हुए बिना कहीं कुछ न होगा ।
“षड्दर्शन, निगमागम और तन्त्रसार से उनके दर्शन नहीं होते । वे तो भक्ति-रस के रसिक हैं, आनन्दपूर्वक हृदय-पुर में विराजमान हैं ।
"खूब व्याकुल होना चाहिए । एक गाने में है - राधिका के दर्शन सब को नहीं होते ।
(क्रमशः)

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