सोमवार, 13 दिसंबर 2021

*निवृत्तिमार्ग । वासना का मूल–महामाया*

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*निश्‍चल करतां जुग गये, चंचल तब ही होहि ।*
*दादू पसरै पलक में, यहु मन मारै मोहि ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(५)निवृत्तिमार्ग । वासना का मूल – महामाया*
ईशान हाजरा के साथ काली-मन्दिर गये हुए थे । श्रीरामकृष्ण ध्यान कर रहे थे । रात के साढ़े सात बजे का समय होगा । उसी समय अधर आ गये ।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण काली का दर्शन करने गये । दर्शन कर और पादपद्मों का निर्माल्य लेकर उन्होंने सिर पर धारण किया । माता को प्रणाम कर उन्होंने प्रदक्षिणा की और चामर लेकर व्यजन करने लगे । श्रीरामकृष्ण प्रेम में मतवाले हो रहे हैं । बाहर आते समय उन्होंने देखा, ईशान सन्ध्या कर रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - (ईशान से) - क्या तुम तब के आये हुए सन्ध्योपासना ही कर रहे हो ? एक गाना सुनो ।
ईशान के पास बैठकर श्रीरामकृष्ण मधुर स्वर से गाने लगे - ‘गया, गंगा, प्रभास, काशी, काँची कौन चाहता है, अगर काली काली कहते हुए, वह अपनी देह त्याग सके ? त्रिसन्ध्या की बात लोग कहते हैं, परन्तु वह यह कुछ नहीं चाहता । सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती है परन्तु कभी सन्धि नहीं पाती । दया, व्रत, दान आदि 'मदन' को कुछ नहीं सुहाते, ब्रह्ममयी के चरणकमल ही उसका याग-यज्ञ है ।
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"सन्ध्या उतने ही दिनों के लिए है, जब तक उनके पादपद्मों में भक्ति न हो - उनका नाम लेते हुए आँखों में जब तक आँसू न आ जायें और शरीर में रोमांच न हो जाय ।
“रामप्रसाद के एक गाने में है - मैंने युक्ति और मुक्ति सब कुछ प्राप्त कर लिया है, क्योंकि काली को ब्रह्म जान मैंने धर्माधर्म का त्याग कर दिया है ।
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"जब फल होता है तब फूल झड़ जाता है । जब भक्ति होती है, तब ईश्वर मिलते हैं - तब सन्ध्यादि कर्म दूर हो जाते हैं ।
"गृहस्थ की बहू के जब लड़का होने वाला होता है, तब उसकी सास काम घटा देती है । नौ महीने का गर्भ होने पर फिर घर का काम छूने नहीं देती । फिर सन्तान पैदा होने पर, वह बच्चे को ही गोद में लिये रहती है और उसी की सेवा करती है । फिर उसके लिए कोई काम नहीं रह जाता । ईश्वर प्राप्ति होने पर सन्ध्यादि कर्म छूट जाते हैं ।
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"तुम इस तरह धीमा तिताला बजाते रहोगे, तो कैसे काम चलेगा ? तीव्र वैराग्य चाहिए । १५ महीने का एक साल बनाओगे तो क्या होगा ? तुम्हारे भीतर मानो बल है ही नहीं - मानो भीगे हुए चिउड़े के समान हो । उठकर कमर कसो ।
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"इसीलिए मुझे यह गाना नहीं अच्छा लगता 'हरि सो लागि रहो रे भाई । तेरी बनत बनत बनि जाई ॥' 'बनत बनत बनि जाई' मुझे नहीं सुहाता । तीव्र वैराग्य चाहिए । हाजरा से भी मैं यही कहता हूँ ।"
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"पूछते हो, क्यों तीव्र वैराग्य नहीं होता ? इसमें रहस्य है । भीतर वासनाएँ और सब प्रवृत्तियाँ हैं । यही मैं हाजरा से कहता हूँ । कामारपुकुर में खेतों में पानी लाया जाता है । खेतों के चारों और मेड़ बँधी रहती है, इसलिए कि कहीं पानी निकल न जाय । कीच की मेड़ बनायी जाती है और मेड़ के बीच बीच में नालियाँ कटी रहती हैं । लोग जप तप करते तो हैं परन्तु उनके पीछे वासना रहती है ।
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उसी वासना की नालियों से सब निकल जाया करता है ।
"बंसी से मछली पकड़ी जाती है । बाँस तो सीधा ही होता है, परन्तु सिरे पर झुका हुआ इसलिए रहता है कि उससे मछली पकड़ी जाय । वासना मछली है । इसीलिए मन संसार में झुका हुआ है । वासना के न रहने पर मन की सहज ही ऊर्ध्वगति होती है – ईश्वर की ओर ।
(क्रमशः)

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