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*दादू अन्तर एक अनंत सौं, सदा निरंतर प्रीत ।*
*जिहिं प्राणी प्रीतम बसै, सो बैठा त्रिभुवन जीत ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*क्रोध का अंग १७३*
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रज्जब राग रू द्वेष का, सकल सुर हुं मधि खोट१ ।
इन्द्र धनुष धोखे२ बिना, सुभिक्ष३ दुर्भिक्ष४ चोट ॥१८॥
सब देवताओं में भी राग द्वेष का दोष१ है । देखो, इन्द्रधनुष की पूजा२ करे बिना सुकाल३ पर अकाल४ की चोट लग जाती है अर्थात इन्द्र की पूजा करे बिना वह अतिवृष्टि करके सुकाल को नष्ट कर देता है ।
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वायु कुंडाला जलहरि, सुकाल दुकाल१ हि चोट ।
राग द्वेष रवि शशि भरे, नहिं पड़दा नहिं ओट ॥१९॥
सूर्य चन्द्र में भी राग द्वेष भरे हैं । देखो, उनके वायु कुंडाला होता है, यह उनके क्रोध का सूचक है, उससे सुकाल पर दुष्काल१ की चोट लगती है, वर्षा नहीं आती और उनके जलहरि होती है, वह उनकी प्रसन्नता की सूचक होती है । उससे दुष्काल पर चोट लगती है अर्थात वर्षा आती है । यह बात प्रत्यक्ष है, नहीं कोई पड़दा है और नहीं कोई ओट है ।
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वेत्ता१ बावन२ के निकट, भोला३ भूत४ बबूल ।
सोहबति५ सौंधा६ होत है, पै७ गात८ बात९ गत१० शूल ॥२०॥
बावना चन्दन२ के पास बबूल का वृक्ष उग जाय तब चंदन की वायु९ से वह सुगन्धित६ तो हो जाता है किंतु उसके वृक्ष के शूलें तो नष्ट१० नहीं होती । वैसे ही ज्ञानी१ के पास अज्ञानी३ प्राणी४ रहता है तब उसके संग५ से ज्ञानी तो हो जाता है परन्तु७ इसके शरीर८ का क्रोध तो नहीं जाता ।
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सूखे तरु सोख्यंत१ नर, अग्नि उदय अहंकार ।
रज्जब मथिबा२ गोष्टि३ तज, वह्नी४ बैन५ निवार६ ॥२१॥
सूखे अरणि वृक्ष के कष्ठों को घिसने से अग्नि निकल आता है किंतु थोड़ा सा गर्म होते ही घिसना२ छोड़ दे तो अग्नि४ नहीं निकलता । वैसे ही दुर्बल१ नर से वार्तालाप३ करने से अहंकार द्वारा क्रोध प्रकट हो जाता है, तब उससे बात५ करना छोड़६ कर उसका क्रोध शांत करना चाहिये । मौन होने पर उसका क्रोध शांत हो जायेगा ।
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काया काठ सूखे उठै, गोष्टि१ मथ तैं आगि ।
रज्जब सरसे२ ज्ञान जल, जलै नहीं सो जागि३ ॥२२॥
मन्थन करने से सूखे काष्ठ में अग्नि उठ कर उसे जलाता है किन्तु जल से गीले२ काष्ठ में अग्नि नहीं उठता और वह काष्ठ नहीं जलता । वैसे ही दुर्बल शरीर से विवाद१ करने पर उसमें क्रोध उठता है किन्तु आत्म ज्ञान से युक्त हो तो उसमें क्रोध नहीं जगता और वह उससे नहीं जलता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित क्रोध का अंग १७३ समाप्तः ॥सा. ५१७२॥
(क्रमशः)
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