बुधवार, 8 दिसंबर 2021

*२१. बिचार कौ अंग ~ ५३/५६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*२१. बिचार कौ अंग ~ ५३/५६*
.
सांचा रांम सदा रहै, आवै जाइ सो झूंठ ।
कहि जगजीवन जन कही, पथ* हरि पटण अहूंठ* ॥५३॥
(*=*. भगवन्नगर का मार्ग ही अविनाशी है)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु नाम सत्य स्वरूप है अतः वह ही स्थायी है । बाकी अन्य संसार की रीति जो आ जा रही है वह असत्य ही है । चिर स्थायी तो भगवत् का मार्ग ही है ।
.
सांच कह्यां दूखै कोई, सो मूरख अग्यांन३ ।
कहि जगजीवन सुध बुध पूरा४, प्रमुदित सुण हरि ग्यांन ॥५४॥
(३. अग्यांन) (४. सुध बुध पूरा=पूर्ण विवेकी)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जन सत्य कहने पर दुखी होते हैं वै मूर्ख हैं व अज्ञानवश ऐसा करते हैं । संत कहते हैं कि जो विवेकी जन हैं वे प्रभु की बात सुनकर प्रसन्न होते हैं ।
.
सात्विक* का एही अरथ, स्वांति रहै सुख पाइ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, रांम हि मांहि समाइ ॥५५॥
(*=*. स्वाति नक्षत्र की एक बूँद पाकर सन्तुष्ट चातक पक्षी के समान सात्विक पुरुष अल्प प्राप्ति से ही सन्तुष्ट रहता हुआ हरिभजन में लगा रहता है ॥५५॥)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सात्विक पुरुष चातक की भांति स्वाति नक्षत्र की एक बूंद से ही संतुष्ट रहते हैं, उन्हें बहुत की चाह नहीं होती वे थोड़ा पाकर भी हरि भजन में लगे रह कर संतुष्ट होते हैं ।
.
राजस* को एही अरथ, छींन परायो खाइ ।
कहि जगजीवन मार मरि, रांम बिमुख मर जाइ ॥५६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राजस प्रवृति का यह स्वभाव है कि दूसरे का छीन लो अपना स्वार्थ ही करो वे इसी चक्कर में कि दूसरों को मार डालें, में स्वयं भी हत हो मरते हैं उनका जीवन प्रभु विमुख ही रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें