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*शुध बुध सौं सुख पाइये, कै साधु विवेकी होइ ।*
*दादू ये बिच के बुरे, दाधे रीगे सोइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*शिष्य प्रशिष्य हुये तिनसे कहि,*
*संतन सेव करो चितलाई ।*
*साधु पधारत पाक करे तिय,*
*आपन भ्रात हि खीर कराई ॥*
*केवल देख रु बुद्धि उपावत,*
*दो घरि दे करि कूप चलाई ।*
*सोचत जावत संत बुलावत,*
*खीर परुसि रु बेगि जिमाई ॥१९३॥*
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आपके शिष्य प्रशिष्य बहुत हो गये थे । उनसे आप कहते थे – मन लगाकर संतों की सेवा करो ।
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एक दिन संत भी आये थे और केवल कूबाजी की पत्नी के भाई भी आये थे । संतों के लिये तो उसने बाजरा का खीचड़ा बनाया और भाइयों के लिये खीर बनाई ।
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केवलजी ने देखकर विचार किया, यह तो ठीक नहीं, दोनों के लिये एक ही बनाना था । खीर या खीचड़ा तो ठीक था किन्तु इसने मेरे भाइयों के लिये खीचड़ा और अपने भाइयों के लिये खीर बनाई है, यह अनुचित है । उन्होंने संतों को खीर खिलाना चाहा । पानी को खाली करके कहा – पानी तो है नहीं कैसे जिमाओगी ?
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दो घड़े देकर उसे पानी लाने भेज दिया और कुछ विचारते हुये, संतों को बुलाकर खीर परुस कर शीघ्रता से जिमाना आरंभ कर दिया ।
(क्रमशः)

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