गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#०दृष्टान्त०सुधा०सिन्धु* 🌷
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*दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ ।*
*अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *॥९ आत्म निवेदन भक्ति॥*
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*॥ हरि शरण होकर पश्चाताप करे से निष्पाप ॥*
हरि शरणागत होय कर, करे जो पश्चाताप ।
सो पुण्डरीक अमरीष सम, होता है निष्पाप ॥१९४॥
दृष्टांत कथा – पुण्डरीक और अम्बरीष दो मित्र कुरुछेत्र में रहते थे । पुण्डरीक ब्राह्मण और अम्बरीष क्षत्रिय था । कुसंग से धन नष्ट हो गया । और माँगने पर भी भीख मिलाना कठिन हो गया । पूर्व पुण्य से दोनों एक यज्ञशाला में जा पहुँचे ।
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वहां ऋषियों को अपनी कथा सुना कर पश्चाताप करते हुये अपने उद्धार का साधन पूछा । तब एक ऋषि ने कहा – 'तुम लोग पुरी जाकर श्री जगन्नाथजी की शरण लो ।' वे गये किन्तु उन्हें भगवत् मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ । तब हरि कीर्तन करते हुये वहां ही रहे । तीसरे दिन रात को ज्योति के दर्शन हुये, फिर भी कीर्तन करते ही रहे सातवीं रात को भगवान् की मूर्ति का दर्शन हुआ । जिसके प्रताप से वे दोनों निष्पाप होकर सब विद्याओं के विद्वान भी हो गये । इससे सूचित होता है कि हरिशरण होकर पश्चाताप करने से प्राणी निष्पाप हो जाता है ।

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