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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१३८)*
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*१३८. प्रश्न उत्तर । दादरा*
*कोई जानै रे, मर्म माधइये केरो ?*
*कैसे रहे ? करे का ? सजनी प्राण मेरो ॥टेक॥*
*कौन विनोद करत री सजनी, कवननि संग बसेरो ?*
*संत साधु गम आये उनके, करत जु प्रेम घणेरो ॥१॥*
*कहाँ निवास ? वास कहँ ? सजनी गवन तेरो ।*
*घट घट मांहि रहै निरन्तर, ये दादू नेरो ॥२॥*
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भा० दी०-हे साधकसखि ! माधवस्य रहस्यमयं सृष्टिकार्यं कथय, किमपि जानासि किम् ?
सतु ममैकमात्रं प्राणाधारः, स: कथं वसति ? किं विदधाति ? कथमानन्दविनोदं करोति ? केन सह क्रीडति इत्यादि सर्वस्वं किं त्वं वेत्सि ? साधवस्तु तस्य स्मरणं विदधानास्तेन सहैव रज्यन्ति । हे साधिके । स क्व वसति ! तव मनो वा कुत्र गच्छति ? इत्यादिकं सर्वं जानासि किम् ?
सर्वेषां समाधानमाह-
सर्वेषु भूतेषु तस्यैव निवासः ।
भक्ता अपि तमेव ध्यायन्ति ।
य: सर्वेषां हृदयेषु वसति ।
सर्वमपि जगत् तस्यैव कार्यम् ।
तच्च तस्य विनोदमात्रम् ।
उक्तहि कठोपनि-
यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य: करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
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हे साधक सखि ! भगवान् माधव के रहस्यमय सृष्टि बनाने के कार्य को कौन नहीं जानता है ? वह माधव तो मेरे प्राणों का आधार है । वह कैसे रहता है, क्या करता है, किससे-विनोद कर रहा है, इन सब को जानते हो या नहीं ? साधु, संत तो उसी का ध्यान करते हुए उसी के प्रेम में मग्न रहते हैं । हे सखि ! अच्छा यह बताओ कि वह कहां रहता है और, तुम्हारी मनोवृत्ति कहां जा रही है, क्या तुम यह जानती हो ?
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सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर दे रहे हैं कि –
वह सब भूतों में निवास करता है । भक्त उसी का ध्यान करते हैं । वह सब के पास ही रहता है । यह संपूर्ण जगद् जो उसका कार्य है, यह उसका विनोद मात्र है । कठोपनिषद् में लिखा है कि –
परमेश्वर से निकला हुआ यह जो कुछ भी संपूर्ण जगत् है, वह प्राण स्वरूप परमेश्वर में ही चेष्टा करता है । इस उठे हुए वज्र के समान महान् भय-स्वरूप(सर्वशक्तिमान्) परमेश्वर को जो जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं । जो सब प्राणियों का अन्तर्यामी, सब को वश में करने वाला, वह परमात्मा अपने एक ही रूप को बहुत प्रकार से बना लेता है । उस अपने अन्दर रहने वाले परमात्मा को जो ज्ञानी पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, उन्हीं को सदा अटल रहने वाला परमानन्द स्वरूप वास्तविक सुख मिलता है, दूसरों को नहीं ।
(क्रमशः)

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