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*देह रहै संसार में, जीव राम के पास ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*क्रोध का अंग १७३*
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क्रोध न माने बोध को, जैसे बीज१ सु वारि ।
रज्जब देखों घट२ घटा, उभय सु एक विचारि ॥५॥
जैसे बिजली१ जल से नहीं बुझती, वैसे ही क्रोध ज्ञान से नहीं मिटता । देखो, जल पूर्ण बादलों की घटा में बिजली चमकती रहती है और ज्ञानी के शरीर२ में क्रोध चमकता रहता है । अत: ये दोनों एक से ही विचार में आते हैं ।
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बडवानल सो वारिनिधि१, सजल घटा मधि बीज२ ।
त्यों रज्जब जति३ जोर४ है, न करि धकाधकि५ धीज६ ॥६॥
जो बडवानल कहलाता है वह अग्नि समुद्र१ में रहता है और जल युक्त बादलों की घटा में बिजली२ रहती है, वैसे ही सन्यासियों३ में क्रोध का बल४ रहता है । इस बात से अपने हृदय में भय५ मतकर, यह बात सत्य ही है । ऐसा विश्वास६ कर ।
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धातु स्थानिक१ सौ जल निकसै, सो उन्हा२ अंभ३ आवे ।
त्यों रज्जब बल बीज रहति४ में, गाता बात सु लखावे ॥७॥
गर्म धातुओं के स्थान१ से जल निकलता है वह जल३ गर्म४ ही आता है । वैसे ही ब्रह्मचर्य२ युक्त सन्यासियों के शरीर में क्रोध का बीज रूप से रहता है और वह उनकी बातों से दिखाई देता है ।
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जीवत मृतक१ मसाण विधि, मूवा मानसी२ रोस३ ।
रज्जब क्रोध न बोध कोई, भूत देव करैं दोस ॥८॥
जैसे मरकर श्मशान में पहुंचे हुये प्राणी भी भूत तथा देवता होकर दोष रूप रोस करते हैं । वैसे ही जीवित ही मुरदे के समान रहने वाले जीवन्मुक्त१ पुरुषों में भी मानस२ क्रोध३ रहता है । क्रोधी के कोई प्रकार भी ज्ञान नहीं लगता ।
(क्रमशः)

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