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*दादू मिश्री मिश्री कीजिये, मुख मीठा नाहीं ।*
*मीठा तब ही होइगा, छिटकावै माहीं ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*अवतार भी साधना करते हैं – लोकशिक्षार्थ*
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"साधना की बड़ी जरूरत है । एकाएक क्या कभी ईश्वर के दर्शन होते हैं ।
"एक ने पूछा, हमें ईश्वर के दर्शन क्यों नहीं होते ? मेरे मन में उस समय यह बात उठी; - मैंने कहा, 'बड़ी मछली पकड़ना चाहते हो, तो उसके लिए आयोजन करो । जहाँ मछली पकड़ना चाहते हो, वहाँ मसाला डालो । डोरी-बंसी लाओ । मसाले की गन्ध पाकर गहरे जल से मछली उसके पास आयेगी । जब पानी हिलने लगे, तब तुम समझ जाओ कि बड़ी मछली आयी है ।'
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"अगर मक्खन खाने की इच्छा है तो ‘दूध में मक्खन है, दूध में मक्खन है’, ऐसा कहने से क्या होगा ? मेहनत करनी पड़ती है, तब मक्खन निकलता है । 'ईश्वर हैं', 'ईश्वर हैं' इस तरह बकते रहने से क्या कभी ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ? साधना चाहिए ।
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"भगवती ने स्वयं पञ्चमुण्डी आसन पर बैठकर तपस्या की थी - लोकशिक्षा के लिए । श्रीकृष्ण साक्षात् पूर्ण ब्रह्म हैं, परन्तु उन्होंने भी तपस्या की थी, तब राधायन्त्र उन्हें पड़ा हुआ मिल गया था ।
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"कृष्ण पुरुष हैं और राधा प्रकृति, चित्शक्ति आद्याशक्ति है । राधा प्रकृति है - त्रिगुणमयी; इनके भीतर सत्त्व, रज और तम तीन गुण हैं । जैसे प्याज का छिलका निकालते जाओ, पहले लाल और काला दोनों रंग का मिला हुआ हिस्सा निकलता है, फिर लाल निकलता रहता है, फिर सफेद । वैष्णव शास्त्रों में लिखा है - कामराधा, प्रेमराधा, नित्यराधा । कामराधा चन्द्रावली हैं, प्रेमराधा श्रीमती । गोपाल को गोद में लिए हुए नित्यराधा को नन्द ने देखा था ।
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"यह चित्-शक्ति और वेदान्त का ब्रह्म दोनों अभेद हैं । जैसे जल और उसकी हिमशक्ति । पानी की हिमशक्ति को सोचने से पानी को भी सोचना पड़ता है और पानी को सोचने से उसकी हिमशक्ति भी आ जाती है । साँप की तिर्यक् गति को सोचने से साँप को भी सोचना पड़ता है । ब्रह्म कब कहते हैं ? - जब वे निष्क्रिय हैं या कार्य से निर्लिप्त हैं ।
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पुरुष जब कपड़ा पहनता है, तब भी वह पुरुष ही रहता है । पहले दिगम्बर था, अब साम्बर हो गया है - फिर दिगम्बर हो सकता हैं । साँप के भीतर जहर है, परन्तु साँप को इससे कुछ नहीं होता । जिसे वह काटता है, उसी के लिए जहर है । ब्रह्म स्वयं निर्लिप्त हैं ।
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"नाम और रूप जहाँ हैं, वहीं प्रकृति का ऐश्वर्य है । सीता ने हनुमान से कहा था - 'वत्स, एक रूप से मैं ही राम हूँ और एक रूप से सीता बनी हुई हूँ - एक रूप से मैं इन्द्र हूँ और एक रूप से इन्द्राणी हूँ - एक रूप से ब्रह्मा हूँ और एक रूप से ब्रह्माणी - एक रूप से रुद्र हूँ और एक रूप से रुद्राणी । नाम-रूप जो कुछ है, सब चित्-शक्ति का ऐश्वर्य है । ध्यान और ध्याता भी चित्-शक्ति के ही ऐश्वर्य में से हैं ।
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जब तक यह बोध है कि मैं ध्यान कर रहा हूँ, तब तक उन्हीं का इलाका है ।(मास्टर से) इन सब की धारणा करो । वेदों और पुराणों को सुनना चाहिए और वे जो कुछ कहते हैं, उसकी धारणा करनी चाहिए ।
(पण्डित से) "कभी कभी साधु-संग करना अच्छा है । रोग तो आदमी को लगा ही हुआ है । साधु-संग से उसका बहुत कुछ उपशम होता है ।
(क्रमशः)

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