शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

*२२. बेसास कौ अंग ~ ३७/४०*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२२. बेसास कौ अंग ~ ३७/४०*
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सो हरि समरथ रांमजी, जांनि गही वेसास ।
सो जन काहे ऊबरै, सु कहि जगजीवनदास ॥३७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे प्रभु सब समर्थ हैं जो उन पर विश्वास नहीं करता वह कैसे पार उतरेगा ।
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मंजारी सुत ऊबरे, रक्शा कीन्हीं रांम ।
अगनि आंच लागी नहीं, जगजीवन जिहिं ठांम ॥३८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भगवान ने बिल्ली के बच्चों की रक्षा अग्नि में भी की है । उन्हें जरा भी अग्नि की आंच नहीं लगने दी । जहां प्रभु हैं वहां कोइ कष्ट नहीं है ।
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रांम नांम निज विचारै, सकल निरंतर सौंण८ ।
कहि जगजीवन सो बचै, लख चौरासी जौंण९ ॥३९॥
(८. सौंण=शकुन) (९. जौंण=योनि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि राम नाम जो विचारते हैं उनके निरंतर शगुन होते रहते हैं । रामजी का नाम शुभदायक है जो इस राम नाम को कहते हैं, वे ही चोरासी लाख योनियों में बचे रहते हैं ।
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कहि जगजीवन सो लिख्या, बिधना१० अंक लिलाट ।
और न कोई करि सकै, तिल भर बाध११ न घाट११ ॥४०॥
{१०. बिधना=विधाता(ब्रह्मा)} (११. बाध=वृद्धि)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विधाता ने जो भाग्य में लिखा है वह न तिल भर बढता है ना तिलभर घटता है ।
(क्रमशः)

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