मंगलवार, 9 अगस्त 2022

*२५. सबद कौ अंग ~ ९/१२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२५. सबद कौ अंग ~ ९/१२*
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नाद भगति नादहि भजन, नाद हि नूर निवास ।
नाद समावै नाद मंहि, सु कहि जगजीवनदास ॥९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अनहद नाद ही ही भक्ति है वह ही भजन है उसमें ही प्रभु निवसते हैं । और उसी में समाते हैं ।
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नाद अरोगै२ अंचवै३, नाद हि भोजन जास ।
सो नादी नादै तिरपति४, सु कहि जगजीवनदास ॥१०॥
(२. अरोगै-खावे)   (३. अंचवै-पीवै)   (४. तिरपति-तृप्ति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिसका भोजन पानी नाद हो जो नाद से ही जाना जाये और नाद से ही संतुष्ट हो वह ही सच्चा नाद प्रेमी नादी जन है ऐसा संत कहते हैं ।
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नाद अमीरस५ नाद विष, नाद नाद मंहि भेद ।
एक नाद अवनी६ मिल्या, एक नाद हरि वेद ॥११॥
(५. अमीरस-अमृत)   (६. अवनी-पृथ्वी) 
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नाद ही अमृत है यह ही विष है । हर नाद में अंतर है । एक नाद पृथ्वी पर है एक नाद प्रभु के वेद है ।
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नौबत७ नाद अनंत धुनी८, अनंत लोक मैं तास ।
सकल सुंणै रांम कहो, सु कहि जगजीवनदास ॥१२॥
(७. नौबत-इस नामक वाद्य)   {८. धुनी-ध्वनि(आवाज)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि नौबत का स्वर अनंत है जो अनहद हो कर अनंत लोक तक ध्वनित होता है नौबत एक नगाड़े जैसा वाद्य यंत्र है इसके स्वर से रामधुनी सभी सुने ।
(क्रमशः)

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