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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३२)*
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*२३२. ललित ताल*
*बाबा, नांहीं दूजा कोई ।*
*एक अनेक नाम तुम्हारे, मोपै और न होई ॥टेक॥*
*अलख इलाही एक तूँ, तूँ ही राम रहीम ।*
*तूँ ही मालिक मोहना, केशव नाम करीम ॥१॥*
*सांई सिरजनहार तूँ, तूँ पावन तूँ पाक ।*
*तूँ कायम करतार तूँ, तूँ हरि हाजिर आप ॥२॥*
*रमता राजिक एक तूँ, तूँ सारंग सुबहान ।*
*कादिर करता एक तूँ, तूँ साहिब सुलतान ॥३॥*
*अविगत अल्लह एक तूँ, गनी गुसांई एक ।*
*अजब अनुपम आप है, दादू नाम अनेक ॥४॥*
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भाव्दी०-नामभेदादपि नामधारिणो न भेदोऽस्ति । द्वैतं तु सर्वथा नास्त्येव । यथैकस्या एव धेनोर्बोधनार्थ देशकालभेदादनेके शब्दाः प्रयुज्यन्ते गावी गौणी गोता गोपोतिलिकाः । तथेश्वरस्याऽपि देशकालक्रियादिभेदतो नामानि भिद्यन्ते । हे प्रभो त्वमेवाऽलक्ष्यरामदयानिधिस्वामिमोहनकेशवोदार सृष्टिकर्तृ प्रभृतिभि: शब्दैव्यसेपदिश्य । हे प्रभो ! त्वमेव पावनपवित्रोऽसि । त्वमेवस्थिर: कर्ता चास्ति ।त्वमेव सर्वव्यापकश्चदृश्यसे । त्वमेव सर्वेषु प्राणिषु रमणाद् दादूरामइति व्यपदिश्यसे । त्वमेव विष्णु त्वमेव साहिब सुलतान अल्लाह शब्दैः कीर्त्यसे । त्वमेव स्वाधीन: स्ववशी शब्दै रनुपमोऽनुमीयते । भवतोऽनेकानिनामानि परन्तुत्वन्त्वैक एव ।
उक्तं हि श्रीमद्भागवते-
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुणकर्माणि रूपाणि तान्यं वेद नो जनाः ॥
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हे तात ! द्वैत तो सर्वथा है ही नहीं । नाम भेद से भी नामी का भेद नहीं होता है क्योंकि नाम-नामी का अभेद माना गया है । जैसे एक ही गाय के ज्ञान करवाने के लिये देश काल भेद से गावी गौणी गौता गोपोतलिका आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है लेकिन । गौ का भेद नहीं होता ।
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ऐसे ही ईश्वर के लिये भी देश काल गुण कर्मों के अनुसार अनेक नाम हैं, जैसे राम, कृष्ण, ईश्वर, केशव, मोहन, सृष्टि कर्ता, पावन, पवित्र, उदार, हरि, व्यापक आदि शब्दों से ईश्वर का बोध होता है । ऐसे ही यवन संप्रदाय में अल्ला, सांई, करीम, सुलतान, साहिब इन शब्दों से भी भगवान् का ही बोध होता है । वह स्वाधीन अनुपम एक सब को वश में करने वाला वशी इस नामों से व्यपदिष्ट होता है ।
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हे परमात्मन् ! आपके नाम अनन्त हैं लेकिन आप तो एक ही हैं । भागवत में कहा है कि- हे नन्द बाबा ! आपके पुत्र के गुण कर्मों के अनुसार अनन्त नाम हैं । उनको मैं जानता हूं और कोई दूसरा नहीं जानता ।
(क्रमशः)

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