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*साधु शब्द सुख वर्षहि, शीतल होइ शरीर ।*
*दादू अन्तर आत्मा, पीवे हरि जल नीर ॥*
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*श्री रज्जबवाणी पद ~ भाग २*
राग गौड़ी । (गायन समय २ से ६ दिन में)
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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५२ सर्व हितैषी संत । दादरा
आज्ञाकारी बोल हिं साध,
आदि अंकूर गुरु मुख गरजै५, सुन सुन शब्द कटे अपराध ॥टेक॥
शाही१ संत चढे गिरी गोविन्द, पृथ्वी हेतु पुकारै ।
भाजि भजो भम भंजन साँई, ज्यों यम दूत न मारै ॥१॥
बाणी बंब२ बजावै बँधू२, जागण हार जगाये ।
जो सुन चले सु पार पहुँचे, रहतों वित्त लुटाये ॥२॥
परम पुरुष पर ब्रह्म बुलाये, नर निस्तारण हारा ।
जन रज्जब जड़ सुनकर सूते, चेत्या४ चेतन हारा ॥३॥५॥
संतों का सर्व हितैषिता बता रहे हैं -
✦ प्रभु की आज्ञानुसार चलने वाले संत बोलते हैं तब उनके शब्दों को बारबार सुनने से पाप कट कर गुरुमुख अर्थात गुरु की आज्ञा में चलने वाले साधकों के आदि आत्म स्वरूप बीज का ज्ञान रूप अंकुर फूट५ निकलता है ।
✦ महान्१ संत गोविन्द रूप पर्वत पर चढकर अर्थात प्रभु को प्राप्त करके पृथ्वी के जीवों के हितार्थ पुकारते रहते हैं - हे भाईयो ! विषय राग से दूर भाग कर भय को नष्ट करने विले प्रभु का भजन ऐसे करो कि जैसे तुम्हें यमदूत न मार सकें ।
✦ वे सबके मित्र३ संत वाणी रूप नगाड़ा२ बजाते हैं अर्थात उपदेश करते हैं और जो जगाने वाले होते हैं, उन्हे जगाते रहते हैं । जो उनका उपदेश सुनकर उनके अनुसार चलते हैं, वे संसार से पार प्रभु के पास पहुचते हैं । जो नहीं चलते उनने अपना आयुरूप धन विषय रूप लुटेरों के हाथ लुटा दिया है ।
✦ परम पुरुष संतों को नरों का उद्धार करने के लिये, परब्रह्म ने ही बुलाया है किंतु फिर भी जड़ प्राणी तो उनकी वाणी सुनकर भी मोह निद्रा में ही सो रहे हैं और जगाने वाले जिज्ञासु जन जाग४ गये हैं ।
(क्रमशः)

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