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*देखत अंधे, अंध भी अंधे,*
*जब लग सत्य न सूझै ।*
*देखत देखे, अंध भी देखे,*
*जब राम सनेही बूझै ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. ३०६)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*देखन गोकुल संत हि आवत,*
*होत मुदित्त सु रीति हि न्यारी।*
*रूंख सु खेजर रूप झुलावत,*
*देख दरस्स भयो सुख भारी॥*
*आय निहारत पूजन नांहि सो,*
*फेरि गयो कहि जाहु तहाँरी।*
*देखि घणे उत झूलत ठाकुर,*
*जाय कही तव लेहु सँभारी ॥२६०॥*
एक समय एक सरल मन वाले संत, गोकुल और वल्लभाचार्य जी के दर्शन करने गोकुल में आये थे। भगवद्भक्ति को उत्पन्न करने वाली वहाँ की विलक्षण रीति को देख कर वे अति प्रसन्न हुये थे।
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फिर वे अपने शालग्राम ठाकुर जी का बटुआ खेजड़ा के वृक्ष की शाखा में लटकाकर वल्लभाचार्य जी के दर्शन करने गये थे और दर्शन करके अति प्रसन्न हुये थे।
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फिर आकर देखा तो उस शाखा में ठाकुर जी का बटुआ नहीं है। संत जी ने वल्लभाचार्य के पास जाकर कहा। आचार्य जी ने कहा- पुनः जाकर वहाँ ही देखिये।
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आकर देखा तो वहाँ वैसे ही बहुत-से बटुवे झूल रहे सन्तजी ने फिर आकर कहा- वहाँ तो मेरे ठाकुरजी के समान ही बहुत-से बटुवे झूल रहे आचार्य जी ने कहा- अपने ठाकुर जी का बटुआ पहचान लो। नित्य सेवा-पूजा करते हो, फिर नहीं पहचानते हो ?
(क्रमशः)

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