मंगलवार, 16 अगस्त 2022

*होत प्रकाश दया अनुरूपं*

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🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏
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*ज्यों यहु समझै त्यों कहो, यहु जीव अज्ञानी ।*
*जेती बाबा तैं कही, इन एक न मानी ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*आँख हुई फिर तो नहिं भूलत,*
*देहु दिखाव अबै मम रूपं ।*
*आप कहै अबके फिर देखहु,*
*हेत लगाय सु जान अनूपं ॥*
*जात हि पावत कंठ लगावत,*
*नैन भरावत पाय स्वरूपं ।*
*रात रु द्यौस१ भजै रु जपै२ हरि,*
*होत प्रकाश दया अनुरूपं ॥२६१॥*
संतजी के आँख हुई अर्थात् विचार आया कि यह चमत्कार आचार्य जी का ही है। तब संत जी ने प्रार्थना की- फिर कभी ऐसी भूल नहीं करूँगा, अब तो आप मेरे ठाकुर जी का रूप दिख दीजिये।
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आचार्य बोले- प्रेम से सेवा पूजा किया करो, ठाकुरजी कहाँ और आप कहाँ, यह ठीक नहीं है। फिर आपने कहा- अब की बार फिर वहाँ ही जाके प्रेमसहित अपनी वृत्ति प्रभु में लगाकर अपने प्रभु का अनुपम रूप जानकर देखो।
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आचार्य जी के कथनानुसार आकर देखा तो वहाँ बटुआ मिल गया। प्रेमसहित बटुआ को कंठ लगाया और अपने ठाकुर जी का स्वरूप प्राप्त होने पर संतजी के नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गये।
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फिर वे रात दिन१ भगवान् का भजन करते हुये हरि की पूजा २ करने लगे। वल्लभाचार्य जी की दया के अनुरूप ही संतजी के हृदय में प्रभु का प्रकाश प्रकट हो गया।
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वल्लभाचार्यजी के दो पुत्र थे- पहले गोपीनाथ और दूसरे विट्ठलनाथ। एक सज्जन शालग्राम शिला और प्रतिमा दोनों की एक साथ पूजा कर रहे थे किनतु उनके मन में भेद भाव था। वे शिला को अच्छी और प्रतिमा को निम्न श्रेणी की समझते थे। आचार्य ने उनको समझाया कि भगवद्-विग्रह में ऐसा भेद भाव नहीं रखना चाहिये।
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इस पर वे सज्जन बिगड़ गये और अकड़ कर प्रतिमा की छाती पर शालग्राम को रखकर रात में पधराया। प्रातः काल देखा तो शालग्राम शिला का चूर्ण हो गया है। तब उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ और आचार्य के पास जाकर क्षमा माँगी। आचार्य ने भगवान् के चरणामृत से उस चूर्ण को भिगो कर गोली बनाने को कहा। ऐसा करने पर वह पुनः ज्यों का त्यों शालग्राम बन गया।
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वल्लभाचार्यजी ने विष्णुस्वामिसम्प्रदाय के भक्ति सिद्धान्तों का अधिक प्रचार किया है। आपने ब्रह्म सूत्र पर अणुभाष्य लिखा। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध तथा कुछ अन्य स्कन्धों पर सुबोधिनी टीका लिखी। अन्त समय में आप पुनः काशी चले गये थे। वि० सं० १५८७ आषाढ़ शु० ३ को ५२ वर्ष की आयु में काशी के हनुमान घाट पर गंगा स्नान करते समय लोगों के देखते देखते ही आकाश में लीन हो गये थे ।
(क्रमशः)

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