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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२५. सबद कौ अंग ~ १७/२०*
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सुरतैं कीजै बादुला१, निरमल एक हि ठांइ२ ।
जगजीवन आवै सकल, सबद कमाया मांहि ॥१७॥
(१. बादुला-आकाशगमन) (२. ठांइ-स्थान)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जी आकाश मण्डल में ध्यान हो ऐसी कृपा करें वह ही निर्मल तत्त्व है । उसके अन्दर ही जितना जाप किया है वह सब आ जाता है । देह का आकाश हमारे मस्तिष्क में है ।
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पाप बिलै३ कर नाखिये, परगट कीजै पुन्य ।
जगजीवन तो मिलि रहै, सबद समान सुन्य ॥१८॥
{३. बिलै-विलय(नाश)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु पापों को खत्म कर पुण्य का उदय कीजे । ऐसा हो जाय तो फिर राम नाम शब्द से ही जीव शून्य हो प्रभु से मिल सकेंगे ।
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प्राक्रित ओम संस्क्रित सोहं, अंस हंस तत तेज ।
कहि जगजीवन मसी४ व्है, रहै रांम की सेज ॥१९॥
{४. मसी-मसृण(=मुलायम या विनीत)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्राकृत का ओम संस्कृत का सोहम से यत्र तत्र तेज हंस जैसे विचरण करते हैं । जो जितना विनीत होगा वह ही प्रभु का सानिध्य पा सकेगा ।
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सेज रहै सो सकल कहै, सकल लहै सब जांम५ ।
कहि जगजीवन प्रीति हरि, प्रेम भगति विसरांम ॥२०॥
{५. जांम-याम(प्रहर=एक निश्चित काल)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो प्रभु की शरण में रहते हैं वे हर प्रहर प्रभु को पाते हैं । संत कहते हैं कि हरि की प्रीत में ही भक्ति व प्रभु प्रेम है ।
(क्रमशः)

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