बुधवार, 17 अगस्त 2022

शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३३

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.२३३)*
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*२३३. समर्थाई । रंग ताल*
*जीवत मारे मुये जिलाये, बोलत गूंगे गूंग बुलाये ॥टेक॥*
*जागत निशि भर सोई सुलाये, सोवत रैनि सोई जगाये ॥१॥*
*सूझत नैनहुँ लोइन लीये, अंध विचारे ता मुख दीये ॥२॥*
*चलते भारी ते बिठलाये, अपंग विचारे सोई चलाये ॥३॥*
*ऐसा अद्भुत हम कुछ पाया, दादू सतगुरु कहि समझाया ॥४॥*
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भा०दी०-सर्वसमर्थशालिन ईश्वरस्येच्छया जीवनपि प्रियते मृतोऽपि जीवति । वाचालोऽपि मूकीभवति । मूकोऽपि मुखायते । योऽसौ रोगाधीनो रात्र्यां निद्रां न लभते, सोऽपि भगवत्कृपया निद्रासुखं लभते । यश्चाविद्यानिद्रायां शेते सोऽपि प्रभुकृपया ज्ञानं प्राप्य जागर्ति । ये चनेत्राग्यां प्रभु न पश्यन्ति तेऽन्यलोचना मताः । ये च जात्यन्या दीनास्ते तव कृपया नेत्रे प्राप्त्य त्वदर्शन योग्या भवन्ति । ये च पद्भ्यां धनार्जनायेत स्ततो धावन्ति तेऽपि त्वत्कृपया सन्तुष्टाः सन्तो ब्रह्मनिष्ठाभवन्ति । ये च पड़व स्तेऽपि तव कृपया गिरिमुल्लङ्कन्ते । सद्गुरुकृपयैव जीव ईश्वरसामर्थ्य वेत्ति । नान्यथा । केनोपनिषदि शाङ्करभाष्ये कथितं यदीश्वरेच्छया तृणमपि व्रजीभवति ।
लिङ्गयुराणे पूर्वार्धे ::
दग्धुं तृणं वाऽपि समक्षमस्य यक्षस्य वहिर्न शशाक विप्राः ।
वायुस्तृणं चालयितुं तथाऽन्ये स्वान्स्वान्प्रभावान् सकलामरेन्द्राः ॥
भागवते-
त्वयैव दत्तं पदमैन्द्रमूर्जितं हृतं तदेवाऽद्य तवैव शोभनम् ।
मन्ये महानस्य कृतोऽनुग्रहो विभ्रंशितो यच्छ्रिय आत्ममोहनात् ।
मूकं करोति वाचालं लड़यते गिरिम्
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥
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सर्वसमर्थशाली ईश्वर की इच्छा से जीता हुआ प्राणी मर जाता है और मरा हुआ जीवित हो जाता है । बहुत बोलने वाला वाचाल भी गूंगा हो जाता है और गूंगा भी बोलने लगता है । जो कोई रोगी रात को निद्रा न आने की पीड़ा से जागता रहता है यदि उस पर प्रभु की कृपा हो जाय तो वह भी निद्रा के सुख को प्राप्त कर सकता है और जो अविद्या निद्रा में सो रहा है वह भी प्रभु की कृपा से ज्ञान प्राप्त करके जाग जाता है ।
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नेत्रों के होते हुए भी जो आपके दर्शन नहीं करते वे अन्धे कहे जाते हैं और जो जाति से अन्धे गरीब हैं वे भगवान् की दया हो जाय तो दर्शनों के योग्य बन जाते हैं । जो धनोपार्जन के लिये ही दिन रात दौडते रहते हैं यदि उन पर भगवान् की कृपा हो जाय तो वे ज्ञान धन से संतुष्ट हो कर ब्रह्मनिष्ठ बन जाते हैं । जो पंगु हैं वे पर्वतों को हरि कृपा से लांघ जाते हैं सद्गुरु की कृपा से ही जीव ईश्वर के सामर्थ्य को जान सकता है । अन्यथा नहीं ।
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केनोपनिषद् के शांकरभाष्य के उपोद्धात में लिखा है कि ईश्वर की कृपा हो जाय तो तृण भी वज्र बन जाता है ।
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लिंगपुराण में –पुर्वार्धे –
हे ब्राह्मणों ! भगवद् रूप यक्ष के समक्ष अग्नि देव न तो तृण को जला सके न वायु तृण को उडा ही सका । इस प्रकार समस्त देवता अपना अपना प्रभाव दिखाने में समर्थ नहीं हो सके ।
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भागवत में कहा है कि –
हे गोविन्द ! आपने ही इसे एश्वर्ययुक्त इन्द्रपद दिया तथा और आज आपने ही छीन लिया । आपका देना जिस प्रकार सुन्दर है उसी प्रकार आपका लेना भी सुन्दर है । मैं ऐसा अनुभव करता हूं कि आपके इस पर महती अनुकम्पा करी है । जो आत्मा को मोहित करने वाली राज्य संपदा से अलग कर दिया । जिसकी कृपा मूक को वाचाल बना देती है । पंगु को पर्वत पर चढा देती है । उस परमानन्द स्वरूप परमात्मा को मैं वन्दना करता हूं ।
(क्रमशः)

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