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*सुख दुख सब झांई पड़ै, तब लग काचा मन ।*
*दादू कुछ व्यापै नहीं, तब मन भया रतन ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ मन का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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"संसारी आदमियों को अवसर कहाँ ? एक ने एक भागवतपाठी पण्डित चाहा था । उसके मित्र ने कहा, 'एक बड़ा अच्छा भागवती पण्डित है, परन्तु कुछ अड़चन है । वह यह कि उसे खुद अपने घर की खेती का काम संभालना पड़ता है, उसके चार हल चलते हैं और आठ बैल हैं । सदा उसे अपने काम की देखरेख करनी पड़ती है; इसलिए अवकाश नहीं है ।
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जिसे पण्डित की जरूरत थी, उसने कहा, 'मुझे इस तरह के भागवती पण्डित की जरूरत नहीं है, जिसे अवकाश ही न हो । हल और बैल वाले भागवती पण्डित की तलाश मैं नहीं करता, मैं तो ऐसा पण्डित चाहता हूँ जो मुझे भागवत सुना सके ।'
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"एक राजा प्रतिदिन भागवत सुनता था, पाठ समाप्त करके पण्डितजी रोज कहते थे, 'महाराज, आप समझे ?' राजा भी रोज कहता, 'पहले तुम खुद समझो ।’ पण्डित घर जाकर रोज सोचता था, 'राजा ऐसी बात क्यों कहता है कि पहले तुम खुद समझो ?"
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वह पण्डित भजन-पूजन भी करता था, क्रमशः उसे होश हुआ । तब उसने देखा, ईश्वर का पादपद्म ही सार वस्तु है और सब मिथ्या । संसार से विरक्त होकर वह निकल गया । एक आदमी को उसने राजा के पास इतना कहने के लिए भेज दिया कि 'राजा, अब वह समझ गया है ।'
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"परन्तु क्या मैं इन्हें घृणा करता हूँ ? नहीं, मैं उन्हें ब्रह्मज्ञान की दृष्टि से देखता हूँ । वे ही सब कुछ हुए हैं - सब नारायण हैं । सब योनियों को मातृयोनि मानता हूँ, तब वेश्या और सती लक्ष्मी में कोई भेद नहीं दीख पड़ता ।
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"क्या कहूँ, देखता हूँ, सब के सब मटर की दाल के ग्राहक हैं । कामिनी और कांचन नहीं छोड़ना चाहते । आदमी स्त्रियों के रूप पर मुग्ध हो जाते हैं, रुपये और ऐश्वर्य देखकर सब कुछ भूल जाते हैं, परन्तु यह नहीं जानते कि ईश्वर के रूप का दर्शन करने पर ब्रह्मपद भी तुच्छ हो जाता है ।
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"रावण से किसी ने कहा था, तुम इतने रूप बदलकर तो सीता के पास जाते हो; परन्तु श्रीरामचन्द्र का रूप क्यों नहीं धारण करते ? रावण ने कहा, 'राम का रूप हृदय में एक बार भी देख लेने पर रम्भा और तिलोत्तमा चिता की खाक जान पड़ती हैं । ब्रह्मपद भी तुच्छ हो जाता है - पराई स्त्री की तो बात ही दूर रही ।'
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"सब के सब मटर की दाल के ग्राहक हैं । शुद्ध आधार के हुए बिना ईश्वर पर शुद्धा भक्ति नहीं होती - एक लक्ष्य नहीं रहता, कितनी ही ओर मन दौड़ता फिरता है ।
(मनोमोहन से) - “तुम गुस्सा करो और चाहे जो करो, राखाल से मैंने कहा, तू अगर ईश्वर के लिए गंगा में डूबकर मर जाय, तो यह बात मैं सुन लूँगा; परन्तु तू किसी की गुलामी करता है, ऐसी बात न सुनूँ ।
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"नेपाल से एक लड़की आयी थी । इसराज बजाकर उसने बहुत अच्छा गाया । भजन गाती थी । किसी ने पूछा, 'क्या तुम्हारा विवाह हो गया है ? उसने कहा, 'अब और किसकी दासी बनूँ ? - एक ईश्वर की दासी हूँ ।'
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"कामिनी और कांचन के भीतर रहकर कैसे कोई सिद्ध हो ? वहाँ अनासक्त होना बहुत ही मुश्किल है । एक ओर बीबी का गुलाम, दूसरी ओर रुपये का गुलाम, तीसरी ओर मालिक का गुलाम - उनकी नौकरी बजानी पड़ती है ।
"एक फकीर जंगल में कुटी बनाकर रहता था । तब अकबर शाह दिल्ली के बादशाह थे ।
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फकीर के पास बहुत से आदमी आयाजाया करते थे । अतिथि-सत्कार की उसे बड़ी इच्छा हुई । एक दिन उसने सोचा, 'बिना रुपये-पैसे के अतिथि सत्कार कैसे हो सकता है ? इसलिए एक बार अकबर शाह के दरबार में चलूँ ।' साधु-फकीर के लिए सब जगह द्वार खुला रहता है । जब फकीर वहाँ पहुँचा, तब अकबर शाह नमाज पढ़ रहे थे ।
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फकीर मसजिद में उसी जगह पर जाकर बैठ गया । उसने सुना कि नमाज पूरी करके अकबर शाह खुदा से कह रहे थे, 'ऐ खुदा, मुझे तू दौलत मन्द कर खुश रख तथा और भी इसी तरह की कितनी ही इच्छाएँ पूरी करने के लिए खुदा से दुआएँ माँगते थे । उसी समय फकीर ने वहाँ से उठ जाना चाहा । अकबर शाह ने बैठने के लिए इशारा किया । नमाज पूरी करके बादशाह ने आकर पूछा, 'आप बैठे थे, फिर चले कैसे ?' फकीर ने कहा, "यह शाहंशाह के सुनने लायक बात नहीं है, मैं जाता हूँ ।'
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बादशाह के जिद करने पर फकीर ने कहा, 'मेरे यहाँ बहुत से आदमी आया करते हैं, इसीलिए मैं कुछ रुपये माँगने आया था ।' अकबर ने पूछा, 'तो आप चले क्यों जा रहे हैं ?' फकीर ने कहा, 'मैंने देखा, तुम भी दौलत के कंगाल हो, और सोचा कि यह भी फकीर ही है, फकीर से क्या माँगू ? माँगना ही है तो खुदा से ही माँगूँगा ।' ”
नरेन्द्र - गिरीश घोष इस समय बस ऐसी ही चिन्ताएँ करते हैं ।
(क्रमशः)

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